इस माह के ग़ज़लकार : शुभेंदु बागची ‘मुन्तज़िर’

• कवि परिचय-
[ • शुभेंदु बागची ‘मुन्तज़िर’ ]
अंतर्राष्ट्रीय प्रवासी बंगाली सांस्कृतिक एवं समाज कल्याण सोसायटी ‘पुबेर हाओआ’ के अध्यक्ष, बांग्ला साहित्यिक संस्था ‘बंगीय साहित्य संस्था’ के महासचिव, वेब पत्रिका ‘दण्डक अरणि’ के संपादक एवं प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के संस्थापक सदस्य शुभेंदु बागची बांग्ला, हिंदी व उर्दू में लगातार लिख रहे हैं. • कविता एवं ग़ज़ल के अलावा आप हमारी सांस्कृतिक धरोहर पर भी निरंतर काम कर रहे हैं. • तीन दिवसीय भारत महोत्सव, तीन दिवसीय फुड फेस्टिवल, 300 कंठ में रविंद्र संगीत का मंचन और राजधानी रायपुर में ‘दंडक स्मृति सम्मेलन’ का सफल आयोजन इनके नेतृत्व में किया गया. • शुभेंदु बागची लिखित कहानी ‘जुरान को चाहिए खुला आसमान’ का सफल नाट्य मंचन, इनके निर्देशन में ही किया गया. • बहुमुखी प्रतिभा के धनी शुभेंदु बागची की 100 ग़ज़लों का संग्रह ‘मुन्तज़िर’ प्रकाशधीन है. • इस अंक में पढ़ें- नई ग़ज़ल ‘ये नज़राना गोया जन्नत पर भारी है’ एवं ‘लगे झूठी नुमाइश मेरे बगैर’ – संपादक.
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ग़ज़ल –
• ये नज़राना गोया जन्नत पर भारी है

हर गोशे में तेरी रूह… हर गोशे में इश्क भारी है,
तारीख़ में ये नज़राना, गोया जन्नत पर भारी है!
हिज़्र की लम्बी रात, के बाद चुप हर लफ्ज़ जहां..
ग़ज़ल ये लरज़ते होंठों का, हर मे’यार पर भारी है!
विसाल-ए-यार लिखा, जब कुदरत इस तरतीब से..
के कैसे कहें जाना, जान.. चश्म-ए-तर पर भारी है!
मुक्तसर कहा ‘मुन्तजिर’, के नम ये पलकें बता रही,
मंज़िल मिला मुकम्मल,मुन्तजिर फिराक पर भारी है!
इन शब्दों के अर्थ-
भारी होना- हावी होना/गोशा- कोना/तारीख- इतिहास/हिज्र- प्रेमिका से दूरी, जुदाई, विरह/ लरज़ना- कांपना, थरथराना/मे’ यार- कसौटी, कृतियों की परख/विसाल-ए-यार- प्रेमिका से मिलन, अपने प्रिय से मिलन/ अश्क- आँसू, अश्रु/तरतीब- क्रम, सिलसिला, सुव्यवस्था/ चश्म-ए-तर- नम या शोकाकुल आँख/मुख्तसर- संक्षिप्त, सार गर्भित/मुकम्मल- पूर्ण,भरपूर, मनचाहा/मुंतज़िर- इंतज़ार/फिराक- तकलीफ {बिछुड़ने के कारण}, वियोग, जुदाई.
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• लगे झूठी नुमाइश मेरे बगैर

है शिकायतें हजार मगर सुनवाई न हुआ,
वो जो शर्माएं के सुर्ख़ रुखसार न हुआ!
अंग पर चुनरिया, लगे है अंबर के सानी,
जादू काम ना आया के कोई हैराँ न हुआ!
चलों बताएं सबब.., के कसर मेरे न होने में,
वो हूर-ए-शमाईल हुई, मगर मैं रंग न हुआ!
चाल बता रही है जो उज़्र आने में उनकी…
रंग जमे महफ़िल में कोई बजूहात न हुआ!
जुबां पर है उनकी गुल-अफ़्शानी का फ़न..;
मचलते नीली आंखों का भी कहर न हुआ!
चलों बताएं सबब.., के कसर मेरे न होने में,
वो हूर-ए-शमाईल हुई, मगर मैं रंग न हुआ!
ज़ुल्फ़-ए-फरेशाँ के पिछे यूं शर्माना..फुज़ूल है,
के मेरी निगाहों के ख़ुमारी में तेरा नक्श ना हुआ!
लगता है झूठी नुमाइश मेरे बगैर, है बा’इस,
कभी पैमाना.. बगैर सहबा असरदार न हुआ!
चलों बताएं सबब.., के कसर मेरे न होने में,
वो हूर-ए-शमाईल हुई, मगर मैं रंग न हुआ!
इन शब्द के अर्थ-
सुर्ख- लाल या रक्त वर्ण/ रुखसार- गाल, कपोल या चेहरा/सानी- मुकाबले का, तुल्य, समान,समकक्ष, जोड़ जैसे/सबब- कारण, वजह/हूर- ए-शमाइल- स्वर्ग की अप्सरा {हूर} जैसे गुणों, हाव-भाव या आदतों वाली अत्यंत सुंदर स्त्री/ वजूहात- {वज्ह की बहुवचन} वजहों/उज्र- बहाना, टाल- मटोल/अंदाज़-ए-गुल- अफ़शानी- फूल बरसाने का अंदाज़ {बेहद खूबसूरत और दिलकश अंदाज़}/जुल्फ़-ए-परेशां- बिखरी हुई जुल्फ़, बिखरे हुए बाल/नुमाइश- दिखावा/बा’इस- कारण, हेतु, निमित्त, मूल कारण/सहबा- लाल शराब या अंगूर की शराब.
• संपर्क-
• 62601 78471
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