गीत – डॉ. दीक्षा चौबे
▪️
• गीत
– डॉ. दीक्षा चौबे
[ • दुर्ग छत्तीसगढ़ ]

जैसी हूँ मैं बस वैसी ही, अस्तित्व यह स्वीकार हो।
कागज के नकली फूलों से, नहीं मेरा शृंगार हो।।
जिस साँचे में ढाला जग ने, ढलती मैं चुपचाप रही।
अंतस में चुपके-चुपके ही, यह धारणा पलती रही।
सबको खुश रख पाना मुश्किल, हर कोशिश नाकाम हुई।
सर्वगुणी संपन्न बनाने, आती हो छड़ी जादुई।
झंकृत कैसे हो हृदवीणा, टूटा जब एक तार हो।।
हाड़-माँस का तन यह मेरा, थक कर हरदम चूर हुआ।
योगदान के अवमूल्यन ने, पीड़ा बन हर पोर छुआ।
जिम्मेदारी के बंधन में, रहती कब तक अधर सिले।
मुझे मानवी ही जग समझे, देवी-संज्ञा नहीं मिले ।
मापदंड बदलें अब सारे, स्त्री से सहज व्यवहार हो।।
ताली दोनों हाथ बजाएँ, पूरक बनकर साथ रहें।
गुण-अवगुण दोनों स्वीकारें, खुलकर मन की बात कहें।
साथ करें दायित्व-निर्वहन, काम न कोई बोझ बने।
समानता की राह चले तो, अहंकार में व्यर्थ तने।
तोड़ अपेक्षाओं के साँकल, समदृष्टि नव आचार हो ।।
🟥🟥🟥
chhattisgarhaaspaas
विज्ञापन (Advertisement)