इस माह के बाल साहित्यकार : कमलेश चंद्राकर

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• कमलेश चंद्राकर
छत्तीसगढ़ शासन से राज्य स्तरीय पंजीकृत समिति प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के आजीवन सदस्य देश के सुप्रसिद्ध बाल साहित्यकार कमलेश चंद्राकर की कुछ बाल रचना सचित्र ‘इस माह के बाल साहित्यकार’ में प्रकाशित की जा रही है. • छत्तीसगढ़ विद्युत मंडल से सेक्शन ऑफिसर के पद से सेवानिवृत्त हुए कमलेश चंद्राकर निरंतर लेखन में सक्रिय हैं. • हाल ही में इन्हें मध्यप्रदेश [भोपाल] से “पन्नालाल शर्मा बाल साहित्य सम्मान” से सम्मानित किया गया. • अब तक प्रकाशित संग्रह- ‘गुनगुने’, ‘ओ दर्द तुम्हारे होंठ खिले’, ‘दादी अम्मा गई किधर’, ‘सारी दुनिया एक तरफ’, ‘सारा जहाँ हमारा है’, ‘स्कूल के दिन आए फिर’, ‘मम्मा मेरी सुनो जरा’ • प्रकाशधीन कृतियाँ- ‘सूरज सा हमें दमकना है’, ‘सुनो अम्मा’, ‘सबेरा रोज आता है’, ‘आँसू भी अंगारे भी’, ‘अवसरों के पाट से’, ‘दोपहरी तेरी धूप मैं’ और ‘ठाढ़ ठाढ़ कहि देथव ते लाग जाथे रंज’ [छत्तीसगढ़ी]. – संपादक
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गर आगे तुमको बढ़ना है

बड़े सबेरे उठना जी
उठते ही मुंह धोना जी
और बैठना लिखने-पढ़ने
समय तनिक ना खोना जी
देर तलक जो सोता है
अपना सब-कुछ खोता है
जल्दी उठने वालों का
काम समय पर होता है
गर आगे तुमको बढ़ना है
समय का मोल समझना है
बीते पल ना लौट के आते
याद हमेशा रखना है
जो काम समय पर करता है
निश्चित आगे बढ़ता है
घर-समाज क्या देश,विश्व का
गौरव एक दिन बनता है
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चिड़िया

देखो फुर्र से आती चिड़िया
और फुर्र उड़ जाती चिड़िया
हर दिन सुबह-सबेरे आकर
फुदक-फ़ुदककर गाती चिड़िया
ऐसा कोई घर ना आंगन
जहां न प्रेम लुटाती चिड़िया
उठो, उठो अब सोने वालो
हो गई सुबह,जगाती चिड़िया
बीन-बीनकर दाना-दुनगा
चुगती और चुगाती चिड़िया
बारिश, गरमी, ठंड बचाए
ऐसा नीड़ बनाती चिड़िया
दूर गगन में खो जाती पर
ठांव कहां बिसराती चिड़िया
मिलकर रहना, मगन हो जीना
ऐसा पाठ पढ़ाती चिड़िया
कितना सूना, नीरस लगता
अगर कभी ना आती चिड़िया
कभी भूलकर कैद न करना
पिंजरे में घबराती चिड़िया
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चलो यहां से भाग चलें अब

चूहा बोला-चुहिया रानी
हो गए हाल-बेहाल
सारे घर को छान लिए पर
मिला कहीं ना माल
दो-दो दिन से भूखे हैं हम
हो गई हालत पतली
लगता है हर आदम, घर का
है झकला और झकली
हफ्ते भर से नहीं दिखी है
कोई फल, तरकारी
माथा पकड़े दिखते हैं ये
इनकी क्या लाचारी
डोल गई गर नीयत अपनी
होगा बड़ा भयंकर
कपड़े-लत्ते, कागज-पत्तर
रख देंगे कुतरकर
चुहिया बोली-चूहे राजा
तुम क्या समझो बात
महंगाई से पस्त पड़ी है
ये आदम की जात
ऐसी महंगाई में इनका
बड़ा कठिन है जीना
महंगाई ने नहीं इन्हीं का
अपना भी हक छीना
चलो यहां से भाग चलें अब
ढूंढें नया ठिकाना
ऐसे घर इस महंगाई में
मुश्किल है टिक पाना
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धरा को ऐसे स्वर्ग बनाओ

तुम्हें सुनाऊं एक कहानी
आओ बच्चो, तीन ये प्राणी
माता, पिता व बेटा श्रेष्ठ
मेहनत कर भरते थे पेट
बरखा, गरमी क्या जाड़ा
आलस को कभी न स्वीकारा
बेटा स्कूल से आते ही
निकला करता ले कुल्हाड़ी
वह काट-काटकर पेड़ों को
घर तक ले आता गट्ठों को
लकड़ियां यूं नित कुछ बिक जातीं
कुछ रकम उसे यूं जुट जातीं
वह खुशी-खुशी करता यह काम
और पा जाता श्रम का दाम
पर एक दिन उसी कुल्हाड़ी से
थोड़ी-सी लापरवाही से
उसके ही पांव पे हो गया वार
और फूट पड़ी लोहू की धार
लगता था पीड़ा ले लेगी प्राण
पर पीड़ा से उसे हुआ यह ज्ञान
हर जीव-जंतु क्या मानव, पेड़
पीड़ा सबकी होती एक
जब वार पेड़ पर होता होगा
वो खून के आंसू रोता होगा
फिर वह तो योगी, दानवीर है
सेवारत मानो संत कबीर है
उस निरपराध पर अत्याचार ?
जिससे उपकृत सारा संसार
उसको फिर हुआ बहुत पछतावा
और बड़ी एक मुहिम चलाया
यह उसी मुहिम का नारा है
कितना सुंदर है, प्यारा है
” धरा को ऐसे स्वर्ग बनाओ
पेड़ न काटो, पेड़ लगाओ ”
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बोल मिट्ठू

पढ़ना सीखें, लिखना सीखें
मानें यह विचार
कि बोल मिट्ठू
वरना है जिंदगी बेकार
पढ़ना-लिखना आ जाने से
काम न बनते भार
कि बोल मिट्ठू
अनपढ़ याने हर जगह लाचार
पढ़ना सीख के पढ़ लेंगे हम
हर पुस्तक, अखबार
कि बोल मिट्ठू
कर लेंगे हम ज्ञान का विस्तार
लिखना सीख के लिख लेंगे हम
पाती धुआंधार
कि बोल मिट्ठू
जोड़ लेंगे सारा संसार
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chhattisgarhaaspaas
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