कवि और कविता : कमलेश चंद्राकर

[ • सेवानिवृत्त सेक्शन ऑफिसर छत्तीसगढ़ विद्युत मंडल कमलेश चंद्राकर निरंतर लेखन में सक्रिय हैं. • मुलत: आप बच्चों के लिए कविता लिखते हैं. • प्रगतिशील कविता भी लिखते हैं, आज इनकी कुछ सर्वश्रेष्ठ कविताएं प्रकाशित कर रहे हैं. • कमलेश जी की अब तक प्रकाशित कृति है- गुनगुने/ओ दर्द तुम्हारे होंठ खिलें/दादी अम्मा गई किधर/सारी दुनिया एक तरफ/सारा जहाँ हमारा है/स्कूल के दिन आए फिर और मम्मा मेरी सुनो जरा. • प्रकाशनाधीन कृतियाँ- सूरज सा हमें दमकना है/सुनो मम्मा/सबेरा रोज आता है/आँसू भी अंगारे भी/अवसरों के पाट से/दोपहरी तेरी धूप मैं/ और ‘ठाढ़ ठाढ़ कहि देथव ते लाग जाथे रंज’ [छत्तीसगढ़ी].
सम्मान- अगासदिया नारायणलाल परमार बाल साहित्य सम्मान/साहित्य वैभव सम्मान और पन्नालाल शर्मा बाल साहित्य सम्मान [भोपाल]. ]
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वर्तमान और आने वाला कल

सीखो
वर्तमान को
फौजी के मानिंद
चुस्त और चौकन्ना होकर
मुट्ठियों में भींचना
सीखो
वर्तमान को
श्रम की रजत बूंदों से
बारंबार जीतना
सीखो
वर्तमान को
सूझ की पारदर्शी धाराओं से
लगातार सींचना
सीखो
वर्तमान की पीठ पर
सवार होकर
शाश्वत मूल्यों
और
सौमनस्य की स्थापना खातिर
समग्र धरती
और
समग्र आकाश तक विचरना
कि वर्तमान
आनेवाले बरगदी कल का
मुस्कुराता हुआ
बीजांकुर होता है
कि वर्तमान
आनेवाले कल की
फौलादी बुनियाद होता है
कि वर्तमान
आनेवाले ऊर्जस्वल कल का
अक्षय शक्ति से संपन्न
नाभिक होता है
कि वर्तमान
आनेवाले ज्योतिर्मय कल का
अपूर्वातीत उत्स होता है
कि आनेवाला कल
वर्तमान का ही
ध्रुव निर्धारण होता है
कि आनेवाला कल
वर्तमान का ही
बोधिसत्वी परिणाम होता है
कि आनेवाला कल
वर्तमान का ही
अभीष्ट श्री फल
और बालसूर्य सा
विहंसता हुआ
सकल सौंदर्य से भरपूर
शीश कमल होता है
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पसीनें की बूंदें

कुदाल उठी नहीं
कि आसमान
उठ जाता है
गज भर और ऊपर
कुदाल गिरी नहीं
कि जमीं
गिर आती है
गज भर और नीचे
ऐसा इसीलिए
कि कुदाल की नोक पर
पसीने की बूंदों का बल
और संकल्प होता है
ऐसा इसीलिए
कि पसीने की बूंदें
हर सृजन
हर सफलता
हर जीत
और हर समृद्धि की
आधारशिलाएं होती हैं
ऐसा इसीलिए
कि पसीने की बूंदें ही
धरती और दुनिया की
आत्मा, अस्मिता
और उपस्थिति की
एकमात्र
नियामक होती हैं
ऐसा इसीलिए
कि पसीने की बूंदे ही
जननी हैं
एक एक सौंदर्य की
ऐसा इसीलिए
कि पसीने की बूंदें ही
आंखें हैं
खेत-खारों की
बाहें हैं
कल-कारखानों की
पांखें हैं
प्रगति की उड़ानों की
ऐसा इसीलिए
कि पसीने की बूंदों से ही
निखरता है स्वरूप
सुबह और सांझ का
दोपहर और रात का
ऐसा इसीलिए
कि पसीने की बूंदों पे ही
खड़ा होता है पहाड़
आनंद का
ऐसा इसीलिए
कि पसीने की बूंदें ही
जनती हैं
सारी की सारी
लहलहाती धरती
ऐसा इसीलिए
कि पसीने की बूंदें ही
फलती हैं
सारे का सारा
ज्योतिर्मय आकाश
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सौगात

मत रखो
मन में
किसी भी तरह का
कोई
मलाल बचाकर
मिलो
हर किसी से
हर बार
आखिरी
मुलाकात की तरह
कि
तुम्हारा
अपनापन
संजीदापन
बासंती आकाश जैसा
खुलापन
और
आदमी होने का
सबूत ही
तुमको
कल शेष रखेगा
अपूर्व सौगात की तरह
कि
जिंदगी की मीन
मुक्त है
मौत के गालों के बीच
जाने
कब गटक जाए
बगुले की
काली करामात की तरह
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पेड़

बेहद आनंदमग्न होकर
अपना सर्वस्व लुटाता
वह दधीचि
कोई और नहीं
समय का सच्चा गवाह
प्रखरतम समाजसेवी
सर्वश्रेष्ठ काव्य पुरुष
धर्मों और संस्कृतियों की आत्मा
शाश्वत परंपराओं का पर्वत
पवित्रता का तीर्थ
पुण्य का झरना
और आरोग्य का घर
महातपस्वी पेड़ है
पेड़
जिसे न तो नाम की परवाह है
और ही न इतिहास में
घुसपैठ करने की कोई चाह
सेवा ही जिसका एकमात्र स्वार्थ है
पेड़ पर झूलते हुए घोंसले
फुदकते – चहकते रंग – बिरंगे पंछी
कूदते – फांदते बानरों के झुंड
और पेड़ के नीचे
पूरी तरावट और शांति के साथ
सुस्ताते हुए पथिक
यही सब तो
पेड़ का
अपना सुख
और अपना संसार है
छाल से काष्ठ तक
पत्तियों से फल तक
और जड़ से रस तक
सब कुछ निछावर है पेड़ का
आदमी
और आदमी के समाज के लिए
पेड़ का अपना
कुछ भी नहीं होता
पेड़
पी रहा है अविरल
शिव की तरह
प्रदूषण का गरल
आदमी के अस्तित्व को
शेष रखने की खातिर
इसलिए
कि आदमी
धरती और आकाश का ही नहीं
सकल ब्रह्मांड का
सृष्टि के रचयिता के बाद
सर्वाधिक बुद्धिमान
और कुशल संचालक है
लेकिन
अंतरिक्ष में गोता लगाने वालो
और ग्रह – उपग्रहों से
खिलौने – से खेलने वालो
ओ आदम के
सतत ऊर्ध्वमान बच्चो
तू सिर्फ
इतना तो और करता चल
उसके बीजों को
जरा से ख्यालात के साथ
धरती पे
जगह – जगह बिखरा तो दिया कर
कि आने वाला
हरा – भरा, समृद्ध और समर्थ कल
इन्हीं बीजों में छुपा होता है
अपनी वसीयत में
पेड़ ने
बस, इतना ही चाहा है
• कवि संपर्क-
• 99819 24900
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chhattisgarhaaspaas
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