कवि और कविता : पल्लव चटर्जी

👉 • पल्लव चटर्जी
[संस्थापक सदस्य- प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ , बांग्ला साहित्यिक संस्था ‘बंगीय साहित्य संस्था’ के कोषाध्यक्ष एवं बांग्ला के सुप्रसिद्ध कवि]
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ईश्वर भी धन्यवाद देता है

देखा है मैंने बहुत से लोगों को
जो ईश्वर से मन्नते माँगते हैं
और जब वो पूरी हो जाती है,
ईश्वर के पास पहुँच जाते हैं
उन्हें धन्यवाद देते हैं
अपने साथ रहने के लिए।
ठीक वैसे ही ईश्वर भी
उन्हें आशीर्वाद देता है और
अच्छा इंसान बने रहने के लिए
धन्यवाद देता है।
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वृंदावन मथुरा

गया था वृंदावन, मथुरा
प्रेम नगरी में तीर्थ भ्रमण पर
और भी गया था
हरिद्वार ऋषिकेश
डुबकी लगाई थी
मन ही मन —
“गंगा मैया की” — जय
बोला था। पवित्र होने के लिए।
ऋषिकेश में नीलकंठ देव के मंदिर
गया था रोप-वे पर चढ़कर
गया था मनसा मंदिर परिसर में भी
शिकायत होती थी हर रात
जब सारे शरीर पर थकान की छाप और
कमर और पैर को जकड़े रहता
दर्द सारी रात।
सोचा थोड़ा स्वास्थ्य बदलने
देहरादून मसूरी चलूँ
चार दोस्त क्रमशः सुब्रत, अपूर्व, किशोर
और मैं (पल्लव) पहुँच गए।
अब दृश्य बदल गया
आराम ही आराम।
सोच और हकीकत में
मेल पाया वहाँ।
असल में प्यार की फसल
तर्क-वितर्क से नहीं
मन की उपजाऊ भूमि में ही उगती है,
और यह भूमि है शरीर।
समझ गया ये तीर्थ, भक्ति, मुक्ति
सब युक्ति है।
हम बहुत कुछ नहीं समझते
सबका मन तो एक साँचे में नहीं बनता।
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प्यार किसे कहते हैं

अँधेरे भरे जीवन में जब अचानक
जुगनू-सी एक रोशनी खिल उठती है
जिसे देखकर दीये की स्निग्ध लौ-सी लगती है
मन के महल में उथल-पुथल शुरू हो जाती है
मन के केंद्रबिंदु में वो रोशनी
बिना प्रवेश-पत्र के दाखिल हो जाती है, समझना
तुम्हारे हृदय में प्यार का गुलाब
खिलना शुरू हो गया है।
इस बीच मन का विश्वास इस क्रिया को
गति देता रहता है।
समय के साथ उसकी लावण्य-प्रभा चंचल हवा के झोंके खाकर
मन के आस-पास मँडराने लगती है
समझ लेना हृदय में प्यार गूँथने लगा है।
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जब इंसान समझ नहीं पाता

जब परिवार, समाज के साथ
अपना तालमेल बिठा नहीं पाता
कभी जब पीठ दीवार से लग जाती है
भाग जाता हूँ अपने कमरे में
कुछ पल तन्हाई में बिताता हूँ
मन ही मन लौट जाता हूँ बाबा-काका की
तसल्ली देने वाली बातों में…
कभी बुदबुदाता रहता हूँ
अपने रटे हुए डायलॉग —
लौट जाता हूँ अपने जमाने
के गाने में गुनगुनाने लगता हुं,
—
“ये क्या हुआ, कैसे हुआ
कब हुआ, क्यों हुआ,
जब हुआ तब हुआ
वो छोड़ो वो न सोचों…”
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chhattisgarhaaspaas
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