इस माह के कवि : प्रकाशचंद्र मण्डल

[ • पांच बांग्ला काव्य संग्रह- ‘तुमि ऐले ताई’, ‘एक फाली रोद्दुर’, ‘आमके उन्मुक्त करो’, ‘कखोन जे कोन कथा कविता होए जाय’ और ‘एखोनो अनेकटा पोथ चोलते बाकी’ एवं दो हिंदी काव्य संग्रह ‘शब्दों की खोज में’ और ‘फिर भी चलना होगा’ के लब्धप्रतिष्ठत कवि प्रकाशचंद्र मण्डल की 50 से अधिक साझा संकलनों के साथ देश के अनेकों साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं लगातार प्रकाशित हो रही हैं. • देश की महत्वपूर्ण संस्थाओं से सम्मानित इनकी कविताएं समाज को दिशा देती है. ‘माँ’, ‘नारी’ और ‘पिता’ पर लिखी अनेकों कविताएं चर्चित हुई. • मेरी समझ में प्रकाशचंद्र मण्डल की कविताएं प्रगतिशील परंपरा से समकालीन कविता को जोड़ती हुई सार्थक रचना है, जो मौन तो है,पर कुछ बोलती है. • कवियों को आम जनमानस के लिए लिखना चाहिए या मेरे ख्याल से कवियों को जनता के पास जाकर उनके दर्द को समझकर लिखा जाए तो आप ‘सर्वहारा साहित्य’ का निर्माण कर सकते हैं. इनकी कविताओं में यह दृष्टि मुझे दिखती है. • प्रकाशचंद्र मण्डल बांग्ला-हिंदी दोनों भाषाओं में सृजन कर रहे हैं. बांग्ला भाषी होने के बावजूद भी हिंदी में भी सार्थक पकड़ है. • प्रमुख सम्मान- ‘भिलाई वाणी’, अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक मेला में ‘उत्कृष्ट कवि सम्मान’, ‘आरंभ’ की तरफ से ‘काव्य गौरव सम्मान’ और ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ की तरफ से दीर्घ साहित्यिक अवदानों के लिए ‘साहित्य रत्न सम्मान’. – संपादक ]
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प्रेम की सुनामी

जानते हो, इस बार तुम्हारे पत्र में
कोई नई खबर नहीं थी।
पिछली बार तुमने कहा था कि
सुनामी आएगी।
तुमने यह नहीं बताया कि
किस तरह की सुनामी आयगी।
इस बार तुम्हारी लेखन शैली
कुछ बदली-बदली है।
मेरी प्रिये, तुम्हारा प्रेम अनंत है
प्राण निकलता है निकलने दो
लेकिन तुम्हारे संग न छुट पाय
तुम और न जाने क्या क्या लिखते थे
लेकिन इस बार,
तुमने ऐसी भाषा में लिखा है
जो तुम्हारे लिए उपयुक्त नहीं है।
एक बार तुम लिखे थे
मैं निशि रात में जाग जाग कर
तुम्हारे सपने देखती हूँ,
आकाश की ओर देखती हूँ,
तारों को निहारती हूं
और गिनती रहती हूं
ये सब चीजें मानो अदृश्य थीं। क्यों?
हाँ, बिल्कुल आखिरी दो पंक्तियों में ही
मुझे समझ आ गया था कि
सुनामी आएगी,
लेकिन वो प्यार की सुनामी
तुम जानते हो?
मैं पूरी रात सो नहीं पाया।
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रुको पथिक तुम कहाँ जा रहे हो?

मैली शरीर दुःखी मन से
फटे पुराने शरीर लेकर
जीवन के अंतिम क्षण में
खंडहर से झरता हुआ मिट्टी जैसे
दृष्टिहीन मज्जा हीन घुटने के बल
तुम जा कहां रहे हो ?
कर्तव्यों की बेड़ा पार कर
क्या तुम थक गए हो,
कि तुम नदी के तीन मोहनाओं कि ओर
चल पड़े हो ?
क्या तुमने अभिमान किये हो
या फिर सर्व सिद्धि लाभ किए हो ?
इस जीवन से तुम्हारा इतना
मोहभंग क्यों ?
तुम सोचे थे की सभी तुमको
सर पर बिठाकर नाचेंगे
क्योंकि तुमने उनका
उपकार जो किया ।
छोड़ो छोड़ो तुम इसका
आशा भी मत करो,
तुम भूल जाओ तुम्हारा जितना
मान अभिमान
यह सब एक दिन
मिट्टी में मिल जाएगा।
तुम्हारी आखिरी नैया आने से पहले
बाकी जीवन को शांति से बिताओ।
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मेरे पिता ही मेरी शाश्वत खुशी हैं

सुख के राज्य में, मेरे पिता ही
सुख का दर्शन कराते थे,
उनका मुस्कुराता चेहरा
मेरे मन को खुशियों से भर देता
पिता, मेरे जीवन के
सभी दुःखों का समाधान हैं,
पिता, इस जीवन का
सबसे मधुर गीत हैं,
मेरी सभी इच्छाएँ, सभी खुशियां
और भी बहुत कुछ
उन्होंने ही पुरा किया ,
मेरे कितनों सपने पुर्ण नहीं होता
अगर मेरे पिता न होते तो ।
कोई भी अरमानों को मैं
पुरा नही कर पाता
अगर मेरा पिता न होते तो
मेरे पिता, मेरे छाते की तरह,
बरगद के पेड़ की तरह,
कितनों तूफान और आंधी में
मेरी देखभाल की है,
मेरे जीवन सुखों से भर दिया है,
कोई भी मेरे पिता जैसा नहीं होगा,
चाहे वह मेरे कितने भी करीब क्यों न हों।
[ • कवि प्रकाशचंद्र मण्डल प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के संस्थापक सदस्य व ‘आरंभ’ प्रबंध समिति में कोषाध्यक्ष हैं एवं बांग्ला साहित्यिक संस्था ‘बंगीय साहित्य संस्था’ के उपसचिव हैं. ]
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chhattisgarhaaspaas
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