साहित्यनामा – अमृता मिश्रा

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जीवन की आपाधापी
– अमृता मिश्रा
[ शिक्षिका, दिल्ली पब्लिक स्कूल, भिलाई, छत्तीसगढ़ ]

जीवन की आपाधापी में
कितना कुछ छूट जाता है,
कल तक जो अपना लगता था वक़्त उसे भी ले जाता है।
नई राह, नए रिश्तों में
मन फिर भी रम जाता है,
पर बीते आँगन की खुशबू
चुपके-चुपके आ जाती है।
पाने की हर इक खुशी में
थोड़ा-सा सूनापन है,
जैसे हँसते चेहरे के पीछे
कोई गहरा क्रंदन है।
बचपन की वो धूप पुरानी,
माँ की मीठी लोरी है,
पिता के काँधे बैठा सपना
अब केवल स्मृति-डोरी है।
कुछ चेहरे धुँधले पड़ते हैं,
कुछ आवाजें खो जाती हैं,
भीड़ भरे इन रास्तों में
अपनी राहें सो जाती हैं।
जीवन की इस भागमभाग में
मन कितना थक जाता है,
जो पाया वह कम लगता है,
जो खोया याद आता है।
सच तो यह है, पाने से ज़्यादा खोना भारी होता है,
हर बिछड़ा पल उम्रभर
मन पर ऋणी-सा रहता है।
फिर भी जीवन चलता रहता, समय न पीछे मुड़ पाता है,
आँसू पीकर भी मानव
नए स्वप्न फिर बुन जाता है।
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chhattisgarhaaspaas
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