■कविता : ■मूल बांग्ला कवि-पल्लव चटर्जी. ■अनुवादक-तारकनाथ चौधुरी.

♀ लब्ध प्रतिष्ठित बांग्ला कवि पल्लव चटर्जी द्वारा बांग्ला में लिखी कविता ‘पृथिबी टा बोदलायनी’ का हिंदी अनुवाद तारकनाथ चौधुरी ने किया है.
पल्लव चटर्जी का कवि मन जिस रूप में पृथ्वी को देखा और मानवीय चरित्र का अवलोकन किया,उसे कविता में पिरोने का प्राणप्रण प्रयास किया.
♀ पृथ्वी नहीं बदली
आज भी
पृथ्वी नहीं बदली…
मिर्च का तीखापन,
करेले की कड़वाहट,
इमली का खट्टापन
रसगुल्ले की मिठास
अब भी पहले की तरह ही है।
दक्षिणेश्वर मंदिर में
माँ काली
पुरी में बाबा जगन्नाथ
अब भी हैं विराजित…
गतिमान है-
कोलकाता का मेट्रो रेल
प्रवाहमान है-
हावडा़ ब्रिज के नीचे से
गंगा,
आज भी उसी दिशा में…
कौन कहता है-
पृथ्वी बदल गई है?
श्वास-प्रश्वास में
वही हवा है,
आँगन की घास
अब भी हरी है,
चीनी मीठी है,,
लवण(नमक)ने
खोया नहीं है
खारापन….
फिर क्यों कहते हैं कि
पृथ्वी बदल गई?
अब भी हँसी है,क्रंदन है,
कच्ची झोपडी़,पक्का भवन है
वस्तुतः पृथ्वी नहीं बदली,
इंसान बदल गया है
पृथ्वी नहीं बदली,
हम बदले हैं
अपनी कारगुजारियों से
पृथ्वी को छले हैं।
●कवि संपर्क-
●पल्लव चटर्जी : 7987125860
●तारकनाथ चौधुरी : 8349408210
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chhattisgarhaaspaas
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