■कविता आसपास. ■अमृता मिश्रा ‘निधि’
♀ ये कन्याएं.
ये कन्याएँ आज सड़कों पर नन्हे- नन्हे क़दमों से,
ठुमकती, खिलखिलाती, घूमती, ये कन्याएँ !
चारों ओर ख़ुशी और भक्ति के माहौल में डूबे लोग,
व्यस्त इनकी आवभगत में।
पैरों में माहावर, लाल चुनरी,
जिसे सिर तो कभी कंधे पर सँभालते,
कई लोगों को उपकृत करती हुई,
जा रही हैं अब, वापस अपने-अपने घर।
कुछ इनकी कृपा हो जाए मुझपर,
इस लोभ को नहीं रोक पाती मैं,
और शायद इसीलिए झट से,
जाती हुई सभी बच्चियों को थमा देती हूँ चॉकलेट।
कुछ कदम आगे चल
पुनः वापस आ,पूछती हैं –
आंटी, आप भी करा रहे हो कन्याभोज ??
नही यूँ ही दिया तुम्हें,
क्योंकि बहुत प्यारी गुड़िया
दिख रही हो तुमसब न।
पुण्य की खातिर
एक असत्य तैर गया हवाओं में।
मुस्कुराती बेफ़िक्र, दौड़ती वो चली जाती हैं।
वापस कमरे में आते ही
फिर वही यक्ष प्रश्न कौंधने लगा।
क्या इनकी ये मासूमियत!
सदा बरकरार नहीं रह सकती??
ग्रहण बन कुछ पिशाच,
घूम रहे,
मानव भेष धारण किये
हमारे इर्द गिर्द।
क्यों खबर भी नहीं लगती हमें ?
उनकी मलिन सोच की,
जब तक, नहीं होते हादसे।
क्यों नहीं शक्तिस्वरूपा माँ अंबे
विद्यमान हो अब हर बच्चियों में और
उसी क्षण हो जाये ऐसे असुरों का विनाश
जिस क्षण किसी कलुषित नज़र की
छाया भी पड़े कन्याओं पर।
और ये सदा भरती रहें उड़ान….
इस अंबर में….तितलियों की तरह ही निरंतर।
तितलियों की तरह ही निरंतर………
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chhattisgarhaaspaas
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