■बसंत पंचमी पर विशेष : दिलशाद सैफी.
4 years ago
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♀ ऐसा बसंत बहार हो
♀ दिलशाद सैफी
[ रायपुर छत्तीसगढ़ ]
मधुकर रहे मधुऋतु और मधुमास भी हो
फूलो से लदी कुँज गली हर डालिया हो
जब धान की बालियाँ लहरा रही हो तब
उसमें मचलने को आतुर पराग हो
खेतों में जब पीली-पीली सरसों फूलने लगे
खिलता सूरजमुखी भी मन को मोहता हो
जब कोयल कुक-कुक के मीठे तान सुनाये
भौरें पुष्पों का चुंबन ले प्रेम रस छलकातें हो
स्वर्ण किरण छूने को जिसे लालायित हो उठे
पीले रंगो में खिले चारो ओर जब बाग हो
खग चराचर झूमें मस्ती में बेताब हो कह उठे
ये सुनहरी धरा अपनी और ये सारा आकाश हो
पलाश,सेमल रंग में रंगे शहर,गाँव के रास्ते हो
सारा जग खिल उठे ऐसा “बसंत बहार” हो…।
■कवयित्री संपर्क-
■88898 04412
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