■स्वरांजलि : सुर की लता-लता मंगेशकर.
■कहीं नहीं गई हो
■पूनम पाठक ‘बदायूँ’
[ इस्लामनगर,बदायूँ,उत्तरप्रदेश ]
कहीं नहीं गई हो =
पहाड़ों में नदियों में
पेड़ों में लताओं में
गूंजेगी सदा आवाज
जिव्हा पर सरस्वती वास
हवाओं में महकेगी
खेतों में लहराएगी
बचपन जवानी या बुढ़ापा
अपने स्वर से सबको साधा
बात जहां देश प्रेम की होगी
लता की आवाज कण कण में होगी
जिंदगी की सच्चाई गाई
जिंदगी आप से मुस्कुराई
जो चेहरा हमेशा मुस्कुराया
क्यों हमें उस पर रोना आया
जय हिंद तेरे सम्मान में
तेरे सा नहीं कोई जहान में
आसान नहीं यह कहना कि
दीदी तेरी आवाज थम गई
आवाज बसी है ह्रदय में
गूंज रही है मेरे कान में
मां की ममता हो चाहे
या बहन -भाई का प्यार
महकते हैँ कितने रिश्ते
लता तेरी आवाज में
दर्द को भी इस तरह गाया
कोई आंसू थाम न पाया
तिरंगा यूं ही नहीं मिलता
जीना पड़ता है तीन रंगों को
अनेकों मिले पुरस्कार
भारत रत्न भी हुआ नाम
दो कोकिला हैँ जन्मी भारत
सरोजनी नायडू लता मंगेशकर
धरती अंबर गाएंगे नाम
जब गूंजेगी लता की आवाज
जब तक सूरज चांद चमकेगा
लता तेरा स्वर धरा पर गूंजेगा
बच्चा-बच्चा पढ़ेगा तुझे
कंठ में जिसके सरस्वती बसे
कभी धूप तो कभी चांदनी
आवाज तारों सी झिलमिलाएगी
सरसों के फूल गेहूं की बालियां
सीमा पर पहरा स्त्री का दर्द गहरा
गहनों की झंकार में हो
भक्त ईश्वर के प्यार में हो
लता कहां-कहां तुम नहीं हो
सचमुच तुम कहीं नहीं गई हो
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chhattisgarhaaspaas
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