■’रोज़ डे’ पर उत्खनन मिली 1997 की सतह पर एक पुरानी कविता- शरद कोकास.
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उपहार में दी जाने वाली
नाज़ुक वस्तुओं के साथ
अपेक्षाएँ जुड़ी होती है
जो कभी नहीं टूटती
बेरोज़गारी के दिनों में
जेबखर्च से पैसे बचाकर
खरीदा नाज़ुक सा गुलदस्ता
मिट्टी की कोई मूर्ति
चमकीले टुकड़े जड़ा
लाख का कोई कलम
पालिश किया कोई कर्णफूल
गोर्की की कहानी की किताब
जनगीतों का कोई कैसेट
मन कांपता था
कहीं कुछ टूट न जाए
चटख न जाए कहीं कुछ
कोई खरोंच न आ जाए
चीज़ों पर और मन पर
बरसों बाद भी
खत्म नहीं होती अपेक्षाएँ
शुभकामनाओं की तरह
अल्पजीवी नहीं होती अपेक्षाएँ
शाम के धुंधलके में
पगलाया सा घूमता है एक ख्याल
जस की तस रखी होंगी
सभी चीजें उसके पास
और तो और
हमारा दिया हुआ गुलाब का फूल भी
कहीं न कहीं रखा होगा
किसी किताब के पन्नों के बीच ।
♀ कवि संपर्क-
♀ 88716 65060
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chhattisgarhaaspaas
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