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- ■पिता पर एक कविता : तारक नाथ चौधुरी [चरोदा,भिलाई छत्तीसगढ़]
■पिता पर एक कविता : तारक नाथ चौधुरी [चरोदा,भिलाई छत्तीसगढ़]
♀ मेरे पिता
थोडी़ सी तनख्वाह,
बहुत सी जिम्मेवारियाँ
फिर भी बेपरवाह
मेरे पिता
ठहाकों में बिताते सारा दिन
और शाम को अक्सर
संध्या-पूजन के बाद सुर में गाते–
“समझ मन झूठा है संसार,सुमिर सदा हरि नाम।”
साधनविहीन प्लेटफाॅर्म पर उतरकर
आखि़री यात्री के चले जाने तक
उनकी परेशानियों को हल करने को
देर तक स्टेशन पर रुकने वाले
मेरे पिता
पाँच भाई-बहनों में काम बाँटकर कहते-
“साथी हाथ बढा़ना,मिलकर बोझ उठाना।”
बडो़ं के बीच दादा के नाम से सम्मानित
और बच्चों के मुख से
दादू संबोधन सुन आल्हादित
मेरे पिता
मुहल्ले के बच्चों से पूछते-
“तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा।”
सूर्योदय से पहले नहीं जागने पर,
ठीक समय अख़बार नहीं मिलने पर,
झूठ बोलने पर
क्रोध में अपरिचित से लगने वाले
मेरे पिता
अब किसी संध्या
भजन गाते दिखाई नहीं देते
और न ही सुन पाते हम
किसी सुबह
प्रेरणा के स्वर
किंतु उनके न होने की अनुभूति
किसी क्षण नहीं होती
क्योंकि
आज भी सूर्योदय से पहले
जगा देते हैं-
मेरे पिता
झूठ बोलने से रोकते हैं-
मेरे पिता
ईद के रोज़ जावेद के घर
जाने से नहीं रोकते-
मेरे पिता
हमेशा मेरे साथ होते हैं-
मेरे पिता।
■कवि संपर्क-
■83494 08210
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chhattisgarhaaspaas
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