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- ■समीक्षा : ‘छत्तीसगढ़ के साहित्य साधक’,लेखक-प्रो.अश्विनी केशरवानी. समीक्षक-प्रांजल कुमार.
■समीक्षा : ‘छत्तीसगढ़ के साहित्य साधक’,लेखक-प्रो.अश्विनी केशरवानी. समीक्षक-प्रांजल कुमार.
♀ छत्तीसगढ़ की साहित्यिक यात्रा का सफल रेखांकन.
♀ पुस्तक 31 साहित्य साधकों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर संग्रहित है.
♀ प्रकाशक : श्री प्रकाशन,दुर्ग

■प्रो.अश्विनी केशरवानी
‘छत्तीसगढ़ के साहित्य साधक’ प्रो. अश्विनी केशरवानी की नवीनतम कृति है। इस पुस्तक में उन्होंने 31 साहित्य साधकों के व्यक्तित्व और कृतिव पर अपनी लेखनी चलायी है। इस पुस्तक में संग्रहित सभी ऐसे साहित्यकार हैं जो स्वर्गवासी हैं। इनमें कुछ चर्चित थे और अधिकांश को बहुत कम लोग जानते थे। छत्तीसगढ़ प्रदेश साहित्य साधना में कभी पीछे नहीं रहा है। इस प्रदेश की सृजनशील प्रतिभाएं हिन्दी साहित्य के विकास में अपनी भूमिका निभाती आ रही है। लेकिन यह विडंबना ही है कि उनकी इस भूमिका का सही आकलन एवं मूल्यांकन आज तक नहीं हो सका है। इस पुस्तक के प्रकाशन से निश्चित रूप से उन्हें पढ़ा जायेगा और इस दिशा में प्रयास होगा, ऐसी आशा की जा सकती है। कदाचित् इसीलिए डाॅ. बाबुलाल शुक्ल ने भूले बिसरे साहित्यकारों को याद करना अपनी परंपरा की पहचान के साथ ऋण शोध भी माना है। उनका यह भी मानना उचित है कि वर्तमान की सही पहचान के लिए अतीत की साझेदारी आवश्यक है।
भारतेन्दुकाल में काशी एक साहित्यिक केंद्र था और उसका नाभिकेंद्र भारतेन्दु हरिश्चंद्र थे। उन्होंने तब यहां ‘‘भारतेन्दु मंडल‘‘ एक साहित्यिक संस्था बनायी थी। ठीक इसी प्रकार दूसरा साहित्यिक केंद्र छत्तीसगढ़ के शिवरीनारायण में था जिसका नाभिकेंद्र ठाकुर जगमोहन सिंह थे। वे न केवल भारतेन्दु हरिश्चंद्र के सहपाठी और मित्र थे बल्कि एक उच्च कोटि के कवि, आलोचक और साहित्यकार थे। उन्होंने शिवरीनारायण में ‘भारतेन्दु मंडल‘ की तर्ज में ‘जगन्मोहन मंडल‘ बनाकर यहां के बिखरे साहित्यकारों को न केवल एकत्रित किया बल्कि उन्हें लेखन की दिशा भी दी। इसके पहले यहां साहित्यिक प्रतिभाएं राज्याश्रय में थी और राजा के कार्यो का गुणगान करना उनका प्रमुख विषय था। पं. माखन मिश्र, बाबू रेवाराम, पं. प्रहलाद दुबे, पं. मेदिनीप्रसाद पांडेय ऐसे कवि थे इसलिए उनकी रचनाओं में उन राज्यों की झलक दिखाई देती है। अनेक साहित्यकारों ने स्वतंत्र लेखन किया है। इसलिए उनकी रचनाओं में भक्ति रस, वीर रस के साथ सौंदर्य रस का पान किया जा सकता है। कुछ साहित्यकारों ने लोक साहित्य और वाचिक परंपरा को लिपिबद्ध किया है तो कुछ ने साहित्य, इतिहास और पुरातत्व के क्षेत्र में भी लेखन किया है। लेखक स्वयं भारतेन्दु कालीन साहित्यकार श्री गोविंद साव के छठवीं पीढ़ी के पौध है इसलिए साहित्यिक प्रतिभा उन्हें विरासत में मिली है और उन भूले बिसरे, गुमनाम साहित्यकारों पर क्षेत्रीय, प्रादेशिक और राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहे हैं। कदाचित् ऐसा उन साहित्य साधकों की प्रेरणा रही हो ?
इस पुस्तक में छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों की हिन्दी साहित्य में उपेक्षा की चर्चा की गयी है। वकई हिन्दी साहित्य के इतिहास में यहां के कवियों का नामोल्लेख न होना दुखद तो है ही मगर इसके लिए उनकी रचनाओं का हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखकों को उपलब्ध न होना प्रमुख कारण माना जा सकता है। यह भी हो सकता है कि उन्हें छत्तीसगढ़ जैसे वनांचल और सर्वाधिक पिछड़े प्रांत में ऐसे लब्ध प्रतिष्ठ साहित्यकारों के होने की कल्पना नहीं रही होगी और वे उनकी बिना खोज खबर किये हिन्दी साहित्य का इतिहास लिख डाले ? लेकिन पंडित लोचन प्रसाद पांडेय के प्रयास से अन्यान्य साहित्यकारों की रचना प्रकाशित हो सकी थी। वे इतिहास, पुरातत्व और साहित्य की सभी विधाओं में लेखन किया है। लेकिन उनका जीवन परिचय लिखने का सद्कार्य श्री प्यारेलाल गुप्त ने किया है। पं. अमृतलाल दुबे ने वाचिक परंपरा के गीतों को सस्वर लेखबद्ध करने का स्तुत्य कार्य किया है और जिसे उन्होंने ‘तुलसी के बिरवा जगाये‘ शीर्षक से प्रकाशित कराया भी है।
इस पुस्तक में छत्तीसगढ़ के रीतिकालीन कवि पं. गोपाल मिश्र, बाबू रेवाराम और पंडित प्रहलाद दुबे, भारतेन्दु कालीन रचनाकारों में ठाकुर जगमोहन सिंह, पं. अनंतराम पांडेय, पं. मेदिनी प्रसाद पांडेय, पं. हीराराम त्रिपाठी, पं. मालिकराम भोगहा, पं. पुरूषोत्तम प्रसाद पांडेय, जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु‘, गोविंद साव और महावीर प्रसाद द्विवेदी युग के अन्यान्य मर खप गये उच्च कोटि के साहित्यकारों के व्यक्तित्व और कृतिव को रेखांकित करने का प्रयास स्तुत्य है। पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, द्वारिकाप्रसाद तिवारी विप्र, राजा चक्रधर सिंह चर्चित व्यक्तित्व थे लेकिन अपेक्षाकृत कम चर्चित कवियों में भवानी शंकर षडंगी, डाॅ. लोचनप्रसाद शुक्ल, चिरंजीव दास, कपिलनाथ कश्यप, पं. किशोरीमोहन त्रिपाठी पर भी कलम चलायी गयी है। कुछ अन्यान्य साहित्यकारों को सम्मिलित किया जाना उचित होता मगर लेखक के इस विचार से सहमत हुआ जा सकता कि पुस्तक की सीमा को ध्यान में रखा गया है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि इस पुस्तक के लेखक प्रो. अश्विनी केशरवानी महाविद्यालय में विज्ञान के प्राध्यापक हैं लेकिन उनकी इतिहास, साहित्य और छत्तीसगढ़ की परंपराओं में गहरी अभिरूचि के कारण अभी तक विभिन्न विधाओं में उनकी छः पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। इस पुस्तक के प्रकाशन में संस्कृति विभाग छ. ग. शासन का सहयोग मिलना सुखद है। कुल मिलाकर पुस्तक पठनीय और संग्रहणीय है।
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