■कविता आसपास : शुचि ‘भवि’.
4 years ago
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♀ रिमझिम रिमझिम
कोशिश की है
बचपन से अबतक ही
उछल कर पकड़ लूँ
कुछ बरसती बूँदों को
और टाँक आऊँ वापस
आसमान के कुर्ते पर
और लड़ आऊँ उससे थोड़ा
कि क्यों जुदा कर देता है
वो
ख़ुद से, हमेशा ही
इन बूँदों को,,,,
जा गिरती हैं कुछ
तपते जिस्म पर
और बन जाती हैं पापी,,,
कुछ धरती पर गिर कर भी
हो जाती हैं पावन,,,,
कुछ तैरती हैं नदी में हिलमिल
आस्था के सँग सँग,,,
कुछ हो जाती हैं खारी
बनने फिर से बादल,,,
कुछ बन जाती हैं आँसू
तोड़ कर कच्ची झोपड़ियाँ,,,
कुछ दे जाती हैं तरावट
मेंढकों के सूखे गलों को,,
बस,कुछ ही बन पाती हैं मोती
कि भाग्यशाली सब नहीं होतीं न,,,
सुनो न
ऐ आसमान!
तुम अपनी प्यास बुझाने
जब जब उतरते हो
धरती पर बरसातों में,
तो ख़याल रखा करो न
थोड़ा सा तो
हर बूँद का ही,,,,
■कवयित्री संपर्क-
■98268 03394
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chhattisgarhaaspaas
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