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- ▶️ उपन्यास : ‘ हेतवी ‘ : शुचि भवि.
▶️ उपन्यास : ‘ हेतवी ‘ : शुचि भवि.
▶️ ‘ हेतवी ‘ एक नव विवाहिता घरेलु महिला से लेकर एक वूमेन एन्टरप्रिनियोर बनने तक का सफ़र है यह उपन्यास : भरत दीप [आगरा,उत्तरप्रदेश].

•शुचि भवि [छत्तीसगढ़]
शुचि ‘ भवि ‘ एक बेहद समर्थ लेखनी की धनी ऐसी रचनाकार हैं जिनके रचना संसार में दोहे, गीत, ग़ज़ल, खुली कविता, हाईकु, पिरामिड, लघु कथाएँ आदि अनेकानेक लेखन विधाएँ स्वच्छन्दता पूर्वक विचरण करती हैं!
और अब अपनी लेखनी को विस्तार देते हुए आपने एक लघु उपन्यास रचा है जिसका नाम है “हेतवी” ।
हेतवी !! एक ऐसे मध्यमवर्गीय परिवार की कन्या, जो देहरादून जैसे छोटे शह्र से आती है तथा जिसे अपने माता-पिता से संस्कार तथा जीवन मूल्यों की शिक्षा विरसे में मिली है, ऐसी हेतवी के एक नव विवाहिता घरेलु महिला से लेकर एक वूमेन एन्टरप्रिनियोर बनने तक का सफ़र है यह उपन्यास! कैसे एक पराए घर से आई बेटी स्वयं को अपने पति तथा उसके परिवार के अनुकूल बना लेती है, इसका जीवंत उदाहरण है हेतवी! और उस पर यदि शमीश जैसा प्रेम करने वाला पति तथा अधीरा जैसी ममतामयी सास मिले तो यह सफ़र बहुत आसान हो जाता है।
कहानी से यह भी स्पष्ट होता है कि विवाह मात्र स्त्री-पुरुष का ही मिलन नहीं है अपितु दो परिवारों, दो संस्कृतियों तथा दो विचारधाराओं का आपसी सामंजस्य भी है।
मुझे व्यक्तिगत रूप से यह भी महसूस हुआ कि भले ही कहानी का मुख्य पात्र हेतवी है किन्तु कहानी सिर्फ उसके इर्द-गिर्द ही नहीं चलती है, हेतवी के पति शमीश तथा सास अधीरा , शामली काकी के भाई संजीत के किरदार भी बहुत सशक्त हैं। यहाँ मैं विशेष रूप से अधीरा के किरदार का ज़िक्र करना चाहूँगा जिसने वैधव्य झेलते हुए तमाम सामाजिक एवम् आर्थिक विषमताओं के बा-वजूद अपने परिवार की बागडोर सँभाली तथा शमीश व सायरा की बेहतरीन परवरिश की! अधीरा एक ऐसी सास है जो समाज में रहते हुए भी कई रूढ़िवादी एवम् दकियानूसी परंपराओं को दरकिनार करने का साहस रखती है! अधीरा एक ऐसी सास है जिसने सदैव मन, वचन तथा कर्म से अपनी बहू को अपनी बेटी माना एवम् एक मज़बूत सतून की तरह हेतवी का सहारा बनी रही!
“हमारी बेटियाँ पीहर सा ही ससुराल पा जाएँ
घराना जो भी हो जैसा भी हो क्या फ़र्क पड़ता है ”
काश कि हर सास अधीरा जैसी हो जाए….
एक अति साधारण परिवार की तमाम दुश्वारियों के बा-वजूद जिस प्रकार हेतवी ने अपनी ननद सायरा तथा अपने बच्चों निहिरा, निशंक, निमी, नेहू व यश की उत्तम परवरिश करते हुए उन्हें एक अच्छा भविष्य दिया, तथा अधीरा के प्रोत्साहन से सफलता की सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ते हुए स्वयं को एक बड़ी विज़नेस वूमेन के रूप में स्थापित किया, वह अनुकरणीय है।
जिस प्रकार उपन्यास में क्रमशः पदम सिंह तथा शमीश द्वारा देहरादून और हल्दवानी के इतिहास की व्याख्या की गई है, वह उपन्यासकार के विषय के प्रति गहन अध्ययन तथा अन्वेषण को दर्शाती है।
उपन्यास को 14 खण्डों में विभाजित किया गया है, प्रत्येक खण्ड का आरंभ एक सांकेतिक चित्र तथा दोहे या शेर से होना इसे अपने आप में अनूठा बनाता है।
उपन्यास का कवर पृष्ठ बहुत ख़ूबसूरत है तथा चीख-चीख कर हेतवी के आगाध सुंदरी होने के रचनाकार के दावे की तस्दीक कर रहा है, इसके अतिरिक्त पेपर क्वालिटी, फ़ाॅन्ट साइज़ बहुत अच्छा है, टंकण त्रुटियाँ नगण्य हैं जो कि बहुत सावधानी पूर्वक की गई प्रूफ़ रीडिंग का नतीजा मालूम होती हैं ! इस हेतु प्रकाशक व रचनाकार दोनों ही बधाई का पात्र हैं।
लघु उपन्यास के फ़ार्मेट में यह कृति बहुत ही उम्दा बन पड़ी है तथा पाठक को आदि से अंत तक बाँधकर रखने में शत-प्रतिशत सफल रहती है।
अंत में शुचि भवि जी को उनके इस नायाब शाहकार के लिए अपनी अनंत शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ, तथा आशा करता हूँ कि काश शामली काकी का संजीत और हेतवी एक दूसरे का हाथ सदा-सदा के लिए थाम सकें۔۔۔

•भरत दीप
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chhattisgarhaaspaas
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