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- ▶️ आज शिक्षक दिवस पर विशेष : विजय कुमार तिवारी.
▶️ आज शिक्षक दिवस पर विशेष : विजय कुमार तिवारी.
•शिक्षा, शिक्षक और शिक्षक दिवस.
हम जो कुछ भी सीखते हैं,समझते हैं,ज्ञान,विद्या,आचरण,व्यवहार,नित्य नये अनुभव,नयी तकनीक आदि सभी शिक्षा के अन्तर्गत माने जाते हैं। हम स्वयं सीखते हैं और अगली पीढ़ी को हस्तांतरित करते हैं। हमें जो ज्ञान,विद्या या तकनीक प्राप्त होता है,उसे दूसरों के साथ बांटते हैं। शास्त्रों में इसकी विषद व्याख्या की गयी है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी विकास होता जा रहा है। आज दुनिया में जो भी विकास हुआ है,उसकी जड़ में शिक्षा ही है।
इसका सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष शिक्षक है। शिक्षक वही है जो शिक्षा देता है,शिष्यों के मन में शिक्षा ग्रहण करने का भाव जगाता है। शिष्य को भविष्य में जीने की कला व संघर्ष करना सिखाता है,ऐसा नागरिक बनाता है जो बेहतर दुनिया बनाने में समर्पित होता है। शिक्षक का ही आध्यात्मिक स्वरुप गुरु होता है। गुरु को परमात्मा से भी श्रेष्ठ माना गया है। गुरु की पूजा ईश्वर से पहले करने की मान्यता और परम्परा है। गुरु इसलिए धन्य है,वह ईश्वर का ज्ञान देता है,ईश्वर की पहचान बताता है और पहुँचा हुआ गुरु ईश्वर से मिला भी देता है।
हमारे यहाँ हर वर्ष आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को गुरु-पूर्णिमा मनाने की परम्परा है। इसी दिन शास्त्रों तथा पुराणों की रचना करने वाले वेदव्यास का जन्म हुआ था। इसे व्यास जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। गुरु-पूर्णिमा के दिन भारतवासी अपने गुरुओं को श्रद्धा निवेदित करते हैं। हम शिक्षक दिवस मनाते हैं और व्यापक तरीके से विद्यालयों में शिक्षकों का सम्मान करते हैं। इसकी शुरुआत हुई,जब भारत के द्वितीय राष्ट्रपति और प्रथम उपराष्ट्रपति डा० सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने 1962 में राष्ट्रपति का पदभार संभाला। उनका जन्म 5 सितम्बर 1888 को तमिलनाडु के गाँव में ब्राह्मण परिवार में हुआ था। राष्ट्रपति बनने के बाद उनके छात्रों,मित्रों,शुभचिंतकों और राजनैतिक लोगों ने उनके जन्मदिन को पूरी भव्यता के साथ मनाने का विचार किया। उन्होंने शिक्षकों के योगदान को महत्व देते हुए सुझाव दिया,”मेरे जन्मदिन 5 सितम्बर को ‘शिक्षक दिवस’ के रुप में मनाया जाए।” डा० सर्वपल्ली राधाकृष्णन प्रख्यात शिक्षाविद,महान दार्शनिक,उच्च कोटि के शिक्षक,आस्थावान हिन्दू विचारक और भारतीय संस्कृति के संवाहक थे। उन्हें भारत रत्न की उपाधि दी गयी। यह उनकी दूरदर्शिता ही थी,उन्होंने अपने जन्मदिन को शिक्षकों के सम्मान से जोड़ दिया।
उन्होंने हिन्दू शास्त्रों का गहन अध्ययन किया और स्वाभाविक अंतर्प्रज्ञा द्वारा इस बात पर दृढ़ता से विश्वास करना आरम्भ कर दिया कि भारत के दूरस्थ स्थानों पर रहने वाले ग़रीब तथा अनपढ़ व्यक्ति भी प्राचीन सत्य को जानते हैं। राधाकृष्णन ने तुलनात्मक रूप से समझ लिया,भारतीय अध्यात्म काफ़ी समृद्ध है और क्रिश्चियन मिशनरियों द्वारा हिन्दुत्व की आलोचनाएँ निराधार हैं। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि भारतीय संस्कृति धर्म, ज्ञान और सत्य पर आधारित है जो प्राणी को जीवन का सच्चा सन्देश देती है। उन्होंने दुनिया को भारतीय दर्शन की शिक्षाएं दी और पूरे विश्व से उनसे शिक्षा ग्रहण करने विद्यार्थी आते थे। वे लिखते हैं-“ईसाई आलोचकों की चुनौती से विचलित होकर ही मैं हिन्दुत्व का विधिवत् अध्ययन करके यह पता लगाने को प्रस्तुत हुआ हूँ कि हमारे धर्म का कितना अंश मृत और कितना अंश आज जीवित है।” उनके अनुसार हिन्दू धर्म केवल भारतवासियों के लिये ही प्रेरणा का स्रोत नहीं है वरन् उसमें इतने सद्गुण हैं कि वह विश्व को भी शान्ति और कल्याण का मार्ग दिखा सकता है।
हमारे ग्रंथों में लिखा गया है,जिसके पास न ज्ञान है,न शील है,न गुण है न धर्म है ऐसा व्यक्ति धरती पर विचरण करता हुआ बोझ के ही समान है। ऐसे गुण हमें शिक्षा से प्राप्त होते हैं। शिक्षक स्वयं प्रबुद्ध होता है,ज्ञानी,शीलवान और अनुभवी होता है। उसके मार्ग-दर्शन में शिष्य विद्या,आचरण,उद्यमिता हर तरह की शिक्षाएं ग्रहण करता है। शिक्षा और शिक्षक का प्रथम दायित्व है कि वह योग्य,देश-भक्त,प्रबुद्ध और समर्पित नागरिक बनाये। शिक्षा से ही व्यक्ति का शारीरिक,मानसिक, चारित्रिक,बौद्धिक और हर तरह का विकास होता है। सर्व-शिक्षित व्यक्ति ही सुरक्षित,शक्तिशाली व आत्म-निर्भर भारत बनाने में अपनी श्रेष्ठ भूमिका निभा सकता है।
आज परिस्थितियाँ बहुत बदल गई हैं और हमारी शिक्षा-व्यवस्था बहुत प्रभावित हुई है। विगत सैकड़ों वर्षों में राजसत्ता के सहयोग से हमारी सनातन शिक्षा-व्यवस्था पर खूब आक्रमण हुए हैं। पाश्चात्य शिक्षा की जिन पद्धतियों को लागू किया गया,उससे श्रेष्ठ और समर्पित नागरिक बनने की संभावना धूमिल हुई है। सनातन शिक्षा-व्यवस्था को तबाह किया गया और हमारे विद्यालयों से हमारे सनातन ग्रंथों को दूर रखा गया। परिणाम हमारे सामने है। आज पूरी दुनिया प्रभावित है क्योंकि व्यक्ति-निर्माण की अवधारणा हमारी शिक्षा-व्यवस्था में गौण हो चुकी है। शिक्षकों को समुचित साधन-सुविधा नहीं मिलती। राज्य सरकारें उनका दोहन करती हैं,उनसे सारा काम लेती हैं,शिक्षा के अलावे। शिक्षक भी स्वयं अपना स्तर गिरा रहे हैं और छात्र उनके प्रति सम्मान का भाव नहीं रखते। सरकारें आँख मूँदे बैठी हुई है। शिक्षक ही नहीं,परिवार के लोग,प्रबुद्धजन,राजनेता और धर्मगुरुओं का दायित्व बनता है कि हर व्यक्ति अपने-अपने स्तर से विचार करे,थोड़ी चिन्ता करे और राष्ट्र-निर्माण में भूमिका निभाए। ‘कर्म ही धर्म’ है, अतः बच्चों को सटीक आध्यात्मिक ज्ञान दिया जाय ताकि दया, प्रेम, सदाचार जैसे नैतिक मूल्यों को अपने व्यावहारिक जीवन में अमल करें। शिक्षक समझाएं कि सत्य व अहिंसा में अपार शक्ति है, आपसी भेद-भाव, हिंसा, उन्माद, कट्टरता आदि मानव-धर्म नहीं हैं। शिक्षक यह भी बताएं कि हर प्राणी को ईश्वर ने निरुद्देश्य नहीं भेजा है,हम अपने मानव-जन्म को सार्थक करें। हम मानव-धर्म समझें,राष्ट्र-धर्म समझें,विश्व को उच्चतर मूल्यों की ओर ले चलें, तभी शिक्षा,शिक्षक और शिक्षक दिवस का महत्व है।
•संपर्क –
•91029 39190
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