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अपनों से अपनी बात : कनक तिवारी
🌸 हमारी शान हो…
यादें कभी कभी करवटें बदलती हैं। जब मन में करवटें बदलती हैं, तो कई यादों के कारण टीस भी उठती है। वह भी जिंदगी का एक हिस्सा है। यादें इस तरह भी पूंजी में परिवर्तित हो जाती हैं। बात तब की है। मैं 1994 में राजनीतिक कारणों से मध्य प्रदेश लघु उद्योग निगम का अध्यक्ष बना दिया गया। इस सिलसिले में अधिकतर दिल्ली जाना होता। मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह,केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम और मेरी मदद करने वाले तत्कालीन केंद्रीय मंत्री कमलनाथ से बहुत मुलाकातें होतीं। एक दिन दिल्ली में कमलनाथ ने अपने घर में मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और अरविंद नेताम के साथ मुझे भी दोपहर के भोजन पर आमंत्रित किया। कुछ राजनीतिक गुफ्तगू करनी होती। तो कभी कभी उस सिलसिले में मुझे साथ रखा जाता था।
अचानक मुझे शानी की याद आई जो दिल्ली में बीमार चल रहे थे। यह बहुत तकलीफदेह सूचना थी उनके लिए जो गुलशेर अहमद खां शानी से परिचित रहे हैं। उनके लेखन व्यक्तित्व और उनके स्वभाव से खासतौर पर परिचित जो छत्तीसगढ़ के लोग रहे हैं। मसलन अरविंद नेताम और मैं शामिल थे। उनके लिए बहुत दुखदायी खबर थी कि वह एक तरह से लाइलाज बीमारी का शिकार हो रहे हैं।
खाना खाते शानी की कुछ मदद करनी चाहिए। ऐसा मुझे सूझा। मुख्यमंत्री से रिश्ते ऐसे थे कि मेरी किसी बात को मना नहीं करते थे। उन्होंने कहा बताओ क्या कर सकते हैं। उस समय मध्य प्रदेश भवन में अरुण कुमार रेसिडेंट कमिश्नर थे दिल्ली में। बाद में छत्तीसगढ़ बनने पर उसके पहले मुख्य सचिव बने थे। यही सोचा कि कुछ आर्थिक मदद की जाए।ज्यादा हौसला तो मेरा नहीं बन पाया। मैंने कहा कि कम से कम दो लाख रूपयों की मदद करनी चाहिए। यह एक सम्मान होगा। दिग्विजय सिंह ने अरुण कुमार को फोन किया कि जब तक हम खाना खाते हैं। तब तक हो सके तो दो लाख रूपयों का एक डिमांड ड्राफ्ट शानी जी के नाम से कमलनाथ जी के यहां भेज दो। रेसिडेंट कमिश्नर ने तत्काल ही ड्राफ्ट भिजवा दिया।
दिल्ली के शानी के निवास पर दिग्विजय सिंह अरविंद नेताम और मैं पहुंचे। दिग्विजय सिंह ने थोड़ी देर तक बातचीत की। कुशल क्षेम पूछी। कुछ अनौपचारिक बातचीत भी हुई। उसके बाद मुख्यमंत्री और अरविंद नेताम वापस चलने लगे। दरवाजे के पास पहुंच कर दिग्विजय सिंह ने भाभी के सामने हाथ जोड़े और कहा भाभी यह रख लीजिए। इससे मध्य प्रदेश की सरकार का सम्मान बढ़ेगा। भाभी के हाथ पर वह ड्राफ्ट वाला लिफाफा रख दिया। मुख्यमंत्री और नेताम सीढ़ियां उतर गए। मुझे शानी जी ने रोक लिया। मैं खुद भी रुकना चाहता था। कुछ देर उनसे बात करता रहा। उन्होंने मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया और फिर बाद में मेरी ओर देखते हुए कहा कि यह सब कुछ तेरा किया धरा है। हम समझते हैं। यह ड्राफ्ट तेरी भाभी के काम आएगा। मेरा हाथ पकड़ कर बैठे थे । उनकी आंखें वह सब कुछ कह रही थीं जैसा वे अपनी नायाब कलम से लिखते थे। इसके बाद मेरे आंसू नहीं रुके। मैंनेे उन्हे ढांढस बंधाया तो लेकिन वे देख नही ंपाए कि मेरी आंखों में आंसू छलक रहे थे।
वहां से चला आया। यह मेरी आखिरी मुलाकात है जिसकी याद आई। छत्तीसगढ़ बनने पर मैंने एक कार्यक्रम बिलासपुर में आयोजित किया था। उसमें विष्णु खरे ने शानी पर भाषण दिया था। वैसा व्याख्यान तो मैंने शानी पर कभी नहीं सुना। बिलासपुर के लेखक शाकिर अली भी कम नहीं। उनका शानीजी से गहरा संबंध था। वह भी बहुत अद्भुत बोले। यह हमारा अद्भुत लेखक हमारे छत्तीसगढ़ का और हमारे अद्भुत संस्कृति शिल्पी हबीब तनवीर अगर इस प्रदेश के किसी काम आ सकेंगे, ऐसा सरकार को समझ में आए। तो इससे छत्तीसगढ़ की सरकार का ही सम्मान बढ़ेगा।
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chhattisgarhaaspaas
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