कवि और कविता : डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय [ केंद्रीय विद्यालय, वेंकटगिरी,आंध्रप्रदेश ]
🌸 कमसिन उमर में ही…
कमसिन उमर में ही,वो मर चुका था|
उम्रदराज होने पर, सुपुर्दे खाक हुआ||
वो शहर से बाहर, गलीज़ चीजें सहेजता था|
उसकी रूह कांपती, कचरा पैदा करने वालों से||
उसे शिकायत थी, उसका हिस्सा लूट लिया|
वो डरा-डरा सा था, गुफ्तगू कोई सुन न ले ||
हर तरफ खौफ है, मौत हवाओं में घुली हुई है|
इक खाली पेट है, बेखौफ़ काम तलाशता है||
रौनक लौट आई है, बाजार तवायफ से सजे हैं|
खाली जेबे घरों में हैं,जिन्दगी बुझी-बुझी -सी है||
जुबान कट गई है, रोशनाई चुक चुकी है|
कलम संन्यास पर है,बेजुबान गाए जा हरे हैं||
समस्याएं तवे-सी हैं, हर शख्स रोटी फेंकता है|
पक्ष हो या विपक्ष, बस आपना वोट देखता है||
🌸 आमंत्रण
शांत मन में एक कंकड़ फेंक तुमने
एक थपकी नेह को क्यों दे दिया है?
मौन चलती जा रही थी प्रीत मन की
फूल के ये चित्र क्यों प्रेषित किया है?
बहुत पहले भस्म को मैं मल चुका हूं
इस कली को कोट पर क्यों धर दिया है?
तपते तवे की बूंद सा जो उड़ चला था
आज उसको फिर नयन में भर लिया है।
तप्त रेती पर पड़ा मैं शब्द गढ़ता
रेशमी जज़्बात सा आमंत्रण दिया है।
शांत मन में एक कंकड़ फेंक तुमने
एक थपकी नेह की क्यों दे दिया है।
🌸 माधव तेरी दुहाई है
रोज़गार का वादा करके
कुर्सी पर अधिकार किया
खैरातों का वितरण करके
वैतरणी को पार किया।
नहीं चाहिए राशन गल्ला
दो हाथों को काम मिले
श्रम का मूल्य जान ले पगले
पौरुष का सम्मान पले।
जिसके बल पर सत्ता पाई
उसको ही हथियार बना
कितना और सताएगा रे
पत्थर का भगवान बना।
लोहित है बस एक रंग का
कितने खण्ड बनाता है
इक दिन जाना छूछे हाथों
मद में समय गंवाता है।
खुशहाली का वादा देखा
खाली पेट जवानी है
किस मद में तू डोल रहा
सत्ता आनी-जानी है।
पांचजन्य है पड़ा हुआ
घोर निराशा छाई है
गाण्डीव है टेर रहा
माधव तेरी दुहाई है।
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•कवि संपर्क –
•98265 61819
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chhattisgarhaaspaas
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