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कुछ जमीन से कुछ हवा से : तांदुला की गोद में : विनोद साव
तीन नदियों की गोद में खूब खेले. जीवन जनम तो आजीवन दुर्ग में शिवनाथ की गोद में रहा. बचपन के सत्रह बरस पाटन किनारे खारुन की गोद में आते जाते रहे. किशोरावस्था के आठ बरस बालोद में तांदुला की गोद में बीता. वैसे बालोद एक ऐसा शहर है जहाँ मस्ती छा जाने के कई कारण हैं. अपने आसपास के शहरों में जो मौज मस्ती धमतरी और बालोद में दिखी वह दूसरी जगह कम ही मिलती है. यहां के नौजवानों में मस्ती के रंग खूब भरे दिखे. नस्ल भी सुंदर है.i. यहां हर जवान अपनी मस्ती का एक नया ब्रांड होता था… और यह अलग अलग ब्रांड बालोद की फिजा में घुले गीत-संगीतकला, शेरो-शायरी, खेलकूद, शिक्षा, मजदूर व किसान आन्दोलन सब में दिखे. तब जाने माने शायर जख्मी ‘बालोदवी’ साहब के कलामों को दौवा कव्वाल गाया करते थे. दौवा यानि बहुत प्यारा दोस्त जगेन्द्र ठाकुर के साथ बैठकर हम रफ़ी के नगमे टेबल बजाकर कभी भी और कहीं भी सुन लेते थे. हम लोगों ने एक सरिता संगीत समिति भी बना ली थी जिसमें जितेन्द्र, योगी, किशोर वैष्णव, कुलदीप सिंह कात्याल, कॉमरेड डॉ. दत्ता की बेटी तन्द्रा दत्ता- सब मिलकर गाते बजाते थे और एक समां सा बंध जाता था. बालोद के मशहूर उर्स पाख में हमने शंकर शम्भू और अज़ीज़ नाजा जैसों की कव्वाली सुनी. मजदूर नेता शंकर गुहा नियोगी की हुंकार बालोद न्यायालय के सामने सुनते थे.
बालोद छूटे पचास बरस हो गए हैं पर आज भी इसकी मधुर स्मृतियाँ मुझे रिचार्ज कर देती हैं और मैं कभी कभार यहां आकर अपने खूबसूरत अतीत को झांक आता हूँ. कभी कभी हम अपने अतीत के एक खुशनुमा मोड़ पर आ खड़े होते हैं. हम सिविल लाइन बालोद के उस क्वार्टर के सामने आ खड़े थे जहाँ १९७६ में हम दो भाइयों प्रमोद—विनोद की शादी का मंडप गड़ा था. तब हमारे पिताजी अर्जुनसिंह साव यहां प्राचार्य थे और मैं भी पी.डब्लू.डी (बी.एंड आर) में यहां कार्यरत था. विगत दिनों हम पिता के सहकर्मी रहे शिक्षक अमृत दास के दशगात्र कार्यक्रम में यहां आए थे. वे ९३ वर्ष की आयु का स्वस्थ दीर्घ जीवन प्राप्त कर अमर हुए. उन्होंने मेधावी निर्धन छात्रों के लिए ‘अकिंचन’ छात्रावास बनवा कर उन बच्चों को ऊँची शिक्षा दिलवाई और ऊँचे पदों के योग्य बनाया. एक निर्धन छात्र आगे चलकर कलेक्टर भी हुआ. पिताजी ने दासजी के नाम की अनुशंसा राष्ट्रपति पुरस्कार के लिए की थी जो उन्हें प्राप्त हुआ था. दास जी के घर के पास पवार वकील साहब के घर बैठे तब उनके बेटे केशरी ने लस्सी पिलाकर स्वागत किया.
पाटन में तालाबों, कुओं, बावली में कूदने का अभ्यास कर लिया था पर नदी-नहरों में तैरने का अभ्यास तो बालोद ने करवाया. दल्ली राजहरा रोड पर विशाल आदमाबाद बांध के एक छोर से दूसरे छोर तक साइकिल दौड़ाते. बांध किनारे जंगलों में क्रिकेट खेलते फिर बांध के बीचोंबीच बने एनीकेट में नहाने के लिए कूद पड़ते. यहां दो नदियों का संगम है तांदुला और सूखा नदी का. जहाँ ये दोनों नदियाँ मिलती हैं वहां एक द्वीप बनता है. वह निर्जन द्वीप हमें देवकीनंदन खत्री के उपन्यास ‘चंद्रकांता’ के किसी तिलस्मी उपवन की तरह लगता था. दूसरी छोर पर सिंचाई विभाग का बेहद खूबसूरत सर्किट हाउस था जहाँ के बगीचे में सुन्दर सुन्दर फूल खिले होते. उसके टॉवर में चढ़कर बांध का विहंगम दृश्य देखते थे. अब तो वहां कोई निजी रिसोर्ट खुल गया है और वहां की नैसर्गिक सुन्दरता खो सी गई है. दुर्ग से बालोद प्रवेश करते समय तांदुला पर बने इसके पुल को देखता हूँ. यह पुल से पहले बड़ा रपटा था जिसे हमारे लोक निर्माण विभाग (भवन तथा सड़क) ने १९७५ में फकत छः लाख रुपयों में बनवाया था और इसका उद्घाटन तत्कालीन विधायक हीरा लाल सोनबोइर से करवाया था. सोनबोइर जी का गोरा-नारा ऊँचा पूरा व्यक्तित्व दबंग दिखता था. विधायक बनने से पहले जब वे शिक्षक थे तब उन्हें श्रेष्ठ शिक्षक होने पर दो बार राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त हुआ था.
हम उस पाररास रोड में मधु होटल को खोजते हैं जो नहीं है पर अब वह तिगड्डा मधु चौक कहलाता है. मधु के प्याज बड़ा का स्वाद आज भी मुंह पर है. बालोद का ‘प्याज बड़ा’ इतना चला कि भारतीय रेलवे ने भी बालोद रेलवे स्टेशन की कैंटीन में इसकी ब्रांडिंग कर दी है. यह स्टेशन पर हमेशा उपलब्ध है. बस स्टैंड के पास एक गुमठी थी हरदेव लाल की जिसके पास मिठाई के बस दो आइटम थे- एक गुलाबजामुन और दूसरा खोवा जलेबी. उसके गुलाबजामुन का आकार टेनिस बाल इतना था और पीतल की एक कटोरी में बस एक ही आता था जिसके ऊपर पीतल का चम्मच खोंचकर वह ग्राहकों को देता था… और खोवे की जलेबी तो इतनी बड़ी थी जितना बड़ा स्कूल टूर्नामेंट में हम ‘चक्र’ यानि चक्का फेंका करते थे. हरदेव लाल की अँधेरी गुमठी के सामने दाऊ मालगुजारों के ट्रेक्टर खड़े रहते थे और गुलाबजामुन खोवा जलेबी खाने वालों की यहां होड़ मची रहती थी.
बाबूजी के स्थानांतरित होकर थानखाम्हारिया से यहां आने से पहले मैं एक मसीही परिवार में दीदी नलिनी जेम्स के घर रहता था. वे भी कन्याशाला में व्याख्याता थीं और जीजा जी जेम्स वेल्स ट्रेक्टर और बुलेट मोटर-साइकल के मैकेनिक थे. उनका अपना वर्कशॉप था. जेम्स जीजा एंग्लो-इंडियन थे. उनके पिता दूसरे महायुद्ध में पायलट थे और युद्ध में गए तो फिर वापस नहीं आए. दीदी हमें राखी बांधती और जीजाजी हमें बुलेट में बिठाकर शिकार खेलने जंगल ले जाते. उनकी बन्दूक से छर्रे निकलते थे जिससे पेड़ पर बैठी बहुत सी पडकी चिड़िया ढेर हो जाया करती थीं. हम उन्हें उठा कर चुंगड़ी में रखते थे फिर जीजाजी उन्हें घर लाकर शोरबेदार बनाया करते थे. मैं जिस कमरे में सोता था वहां सलोने सुन्दर रूप में जीसस का एक चित्र टंगा हुआ था. जिसमें भेड़ चराते हुए करुणामय जीसस थे. बालोद में डॉ.लॉरेंस और क्लॉरेंसे दो भाइयों के बड़े जिन्दादिल परिवार रहे जिनमें ज्योति-दी, दीपक, जसवंत (जस्सू) सब अब फेसबुक फ्रेंड हैं. क्रिकेट के हम सब खिलाडी मित्र हर साल विंटर ट्राफी खेलते. जस्सू इनकी कमेंट्री शुरू करता तब मैं अपने पैड बांधकर बैट पकड़कर अपनी टीम से ओपनिंग करने उतर जाता था.

•सिविल लाइन बालोद का वह क्वाटर जहाँ प्राचार्य पिता के साथ हम रहते थे…
•संपर्क –
•90098 84014
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chhattisgarhaaspaas
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