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कर्नाटक के नतीज़ों पर ‘ छत्तीसगढ़ आसपास ‘ की त्वरित टिप्पणी : 2024 की राह दिखाता कर्नाटक चुनाव का नतीजा :
▪️ कर्नाटक अपनी परंपरा को नहीं टूटने दिया : राहुल की राह तय करता कर्नाटक…

वैसे तो राजनीति में कुछ स्थिर नही होता सब जनता के वर्तमान मूड पर निर्भर रहता है,फिर भी चुनावी नतीजों पर यदि गौर करें तो यह रुझान कुछ दूर तक स्थिति को बयां करता है.2024 में लोकसभा का चुनाव है और अभी विधानसभा का चुनाव संपन्न हुआ.कर्नाटक में कांग्रेस को जिस तरह से जनाधार मिला है उससे साफ जाहिर होता है कि “कांग्रेस मुक्त भारत” नही बल्कि “कांग्रेस युक्त भारत” चाहता है.भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने एक नारा दिया था कि देश कांग्रेस मुक्त हो जाएगा. लेकिन गिनती बढ़ने लगी है.
राहुल गान्धी और प्रियंका गान्धी के बड़बोले नही बल्कि सधे हुए जन मार्मिक शब्दों की गूंज जनता के दिलों तक पहुंची और जनता ने जीत उनकी झोली में डाल दी.कर्नाटक चुनाव में नाटक तो खूब हुआ लेकिन उस नाटक का मुखौटा ‘जनता’ थी जो अपना पर्दा खुद से उठाकर कांग्रेस की ओर रुख कर दिया.देश मे अब तक कि हुई बड़ी पैदल यात्रा”भारत जोड़ो यात्रा”की शुरुवाती धूम भी कर्नाटक में मची थी और जीत भी यहीं से हुई.इसका मतलब है कि लोग कांग्रेस को चाहते हैं उसके कार्य प्रणाली को समझते हैं.जनता अब द्वेष नही बल्कि प्रेम चाहती है जो कहीं न कहीं राहुल गांधी के भाषणों में व उनकी शैली में दिखता भी है.हालांकि विपक्ष के भाजपाई इसे जादू की झप्पी न कहकर कुछ दूसरा नाम देते हैं जो शायद तंज कसने का होता है.इस जीत से राहुल का कद बढ़ा है और मैच्योरिटी भी.प्रियंका का पिंक शूट भी कर्नाटक की महिलाओं को भा गया था,दीदी की मुस्कान ने चुनावी जनसभा की भीड़ को आकर्षित तो किया ही साथ ही उनको अपने पक्ष में मतदान करने का जादू भी डाल दिया.प्रियंका गान्धी अपने परिवार की शहादत को जनता के सामने रखते हुए जीत की अपील करी थीं.जिसे कर्नाटक की जनता समझ कर अपना रुख साफ कर दिया.
राजनीति में धर्म तो ठीक लेकिन धर्म मे राजनीति उल्टा हो जाता है.यहां हुआ भी वही धार्मिक भावनाओं के साथ राजनीतिक चाल को जोड़ने का असफल प्रयास किया गया जिससे जनता भांप कर उसे रिजेक्ट कर दिया.अब राजनीति कुछ सुधार व इतर चाहती है जिससे लोगों का भला हो,अस्पताल और विद्यालय के साथ ही सुकून से जीवन जीने की चाह रखती है जनता.राहुल गान्धी अब तो फ्री भी हैं,क्योंकि सदन में बोलने पर ही बवाल मचता था अब वह भी नही होगा.इससे राहुल गान्धी जितना दौड़ लगा सकते हैं लगाएं.एक बात और,कांग्रेस को यह भी ख्याल रखना होगा कि सोच समझ कर खुद बोलें और कांग्रेसी नेताओं को भी समझाइस दें.हालांकि बेघर जब राहुल हुए थे तब माँ ने सहारा दिया था और अब मां के साथ रह रहे हैं तो सुधार तो कुछ होगा ही और माँ का आशीर्वाद भी सुबह सुबह मिलेगा जिससे बहुत कुछ बदलता जाएगा.
कर्नाटक के जीत का जश्न छःत्तीसगढ़ में भी खूब दिखाई दे रहा है.राज्य के मुखिया भूपेश बघेल इस जीत से काफी उत्साहित हैं.होना भी चाहिए क्योंकि प्रियंका की आस भी हैं और खास भी,भूपेश बघेल को चुनावी रणनीति और राजनीति दोनों का ज्ञान व अनुभव है.इनके धैर्यता और कार्यकुशलता का परिचय छःत्तीसगढ़ में मचे बवाल से लगाया जा सकता है,बिना बिचलित व चिंतित हुए जिस तरह से जनसंवाद का कार्यक्रम लगातार चल रहा है उसमें बघेल की जीत दिखती है.हालांकि बीजेपी कुछ भी कर सकती है यह दीगर बात है कि कर्नाटक में नाटक नही पसंद किया गया वहां तो तिरुपति की शहनाई को चाहते हैं लोग. खैर, कर्नाटक के चुनाव का पथ ही अन्य राज्यों के लक्ष्य साधने में सहायक हो सकता है.2023 में अन्य कुछ और राज्यों में भी चुनाव होंगे उन पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है.थकती हारती कांग्रेस में कर्नाटक के नतीजों ने कांग्रेस में एक नई ऊर्जा जरूर संचारित कर दिया है.आदिवासियों के विश्वास का लाभ भी कांग्रेस को मिला.हालांकि भौगोलिक निर्भरता भी प्रदेश की राजनीति तय करती है.

•संजय मिश्र
[ लेखक ‘ छत्तीसगढ़ आसपास ‘ के पॉलीटिकल एडिटर हैं ]
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