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निबंध : डॉ. रा. रामकुमार [बालाघाट मध्यप्रदेश]
🌸 फूल के हरसिंगार
राचौ ऋषिकेश और हरिद्वार से लौट आए हैं। वहां की हवा तो शायद नहीं न ला पाए मगर वहां के फूलों और वनस्पतियों के बीज जरूर ले आए हैं। जी हां, हरिद्वार और ऋषिकेश का अर्थ अब केवल धार्मिक कर्मकाण्ड और साधना नहीं रह गया है। पर्यटन तो था वह पहले से; अभी कुछ वर्ष पहले राजनैतिक समीकरण और बंटवारे का भी वह प्रतीक बन गया है। योग के शारीरिक-संस्थान और आयुर्वेद के विश्व-बाजारवाद की हवा भी इन पर्वतीय नगरों को लग गई है। शुक्र है मेरे मित्र राजनीति और योग का बाजारवाद लेकर नहीं आए। वे कश्मीरी तुलसी, दार्जिलिंग की मिर्ची और हिमाचल के फूूलों के बीज लेकर आए हैं। पहले उन्हें गमलों में अंकुरित किया और एक के बाद एक उन्हें मेरे बागीचे में रोपते गए। पहले उन्होंने कश्मीरी तुलसी लगाई और कई बार आकर उसकी पत्तियों की इल्लियां निकालते और गमले की मिट्टी संवारते रहे।
मेरे उपवन में उन्हें इतनी रुचि क्यों? दो कारण हैं.. एक वे और दूसरे हम। हम अपने बगीचे को चाहनेवालों की चाहतों से दूर नहीं करते। चाहे फूल हों, चाहे सब्जियां हों या चाहे अमरूद और आम के फल हों। जो मांग सकते हैं, वे मांग ले जाते हैं। ज्यादा हो तो हमीं बांट आते हैं। इससे मेल-मिलाप की सुगंध और स्वाद मिलते रहते हैं। पड़ोस है मेरे आसपास, कोई हिन्दुस्तान या पाकिस्तान का राजनैतिक विवाद नहीं है। हां, कुछ संकोची और प्रातः-भ्रमणार्थी भी होते हैं जो घुसपैठियों की तरह जासौन और चमेली के फूलों को चुरा ले जाते हैं। डालियां नहीं टूटती तो हमें भी दुख नहीं होता।
दूसरा कारण वे हैं। वे अपने पिता की जमीन पर भाइयों द्वारा बनाए मकान में सबसे ऊपर उपलब्ध कमरे में रहते हैं। चाहकर भी वे उपवन नहीं लगा सकते। हमारे उदार-उपवन में वे अपनी इच्छाओं का प्रत्यारोपण करते रहते हैं। हमें भी अच्छा लगता है।
इस बार आए तो बोले -‘‘पारिजात का पौधा लाया हूं। आपके बगीचे की सुन्दरता बढ़ाएगा। गेट के बगल यह ठीक रहेगा।’’
कौन सी चीज कहां लगेगी इसका फैसला पत्नी करती है। उसने राचौ को ‘‘जैसा तुम उचित समझो भैया!’’ कहा तो राचौ ने खुद ही लोहे की छड़ उठाई और पौधा रोप दिया। फिर चाय का दौर चलना ही था। चर्चा चली कि पारिजात क्या होता है और कैसा होता है? मैंने पढ़ा तो है कि पारिजात का कोई फूल होता है, मगर देखा नहीं है। राचौ ने बताया कि सफेद रंग के सुगंधित फूल होते हैं। कोई दस फुट का झाड़ ही होता है।(बाद में मेरे ही बाग में 20 फीट का झाड़ हुआ।) पारिजात के फूल रात में खिलते हैं और दिन में झड़ जाते हैं।
मेरी स्मृति में तत्काल एक गीत क्लिक हुआ और बजने लगा -‘‘सांझ खिले, भोर झरे, फूल हरसिंगार के; -रात महकती रहे।’’
अस्वाभाविकता को चुुना? मैं इस गीत को इसलिए नहीं गुनगुनाता था कि मैं उदास होना चाहता था। इसका संगीत संयोजन और खिलने झरने की विपरीतता मुझे आनंद देती थी। उदास गीतों का सौन्दर्य मुझे अक्सर रोमांचित और आनंदित करता है। यह टिपिकल है क्या? मैं उदास गीतों को गुनगुनाकर आनंदित होता हूं कि कितना सहजोच्छवास और अभिव्यक्ति का कितना उदात्त संमिश्रण कवि ने किया है। उदासी मुझे नहीें घेरती, तो क्या मैं संवेदना से शून्य हूं? मेरी मान्यता है कि उदासी के गीतों से भी रस और आनंद की सृष्टि हो सकती है। विरेचन हो सकता है। उदास गीत सुनकर उदास होना ही ईमानदारी नहीं है। गीत के साहित्यिक सौन्दर्य में डूबना भी ईमानदारी है। अगर ऐसा नहीं होता तो कबीर की उलटबासियां अद्भुत नहीं होतीं। अगर ऐसा नहीं होता तो नर्मदा परम्परा के विपरीत पूरब से पश्चिम बहकर पूजनीय नहीं होती।
फिर हरसिंगार, पारिजात या शैफाली का इतना अनादर क्यों?
वैज्ञानिकों ने तुम्हें ‘निक्टेन्थिस अर्बार्टिस्टिस’ यानी रात को खिलनेवाला शोकवृक्ष कहा। तुम्हें ‘ट्री ऑफ सारो’ कहा। फिर यह भी बताया कि किन-किन रोगों को दूर करने के लिए तुम्हारी पत्तियां और छाल काम आती है। घर को महकाने के लिए तुम जलकर भी सुगंध फैलाते हो। सौन्दर्य प्रसाधन में तुम्हारा पेस्ट लाभदायक, सर्दी जुकाम में तुम्हारा काढ़ा कामयाब, साइटिका में तुम्हारी पत्तियों का रस उपयोगी। पेट दर्द और कब्ज तुम्हारी पत्तियों का रस दूर कर देता है। मगर दिमागी कब्ज को कौन दूर करे। इतने लाभकारी होने के बाद भी कृतघ्न समाज तुम्हें मनहूस समझता है जबकि तुम सुबह-सुबह उनके लिए पांवड़े बन जाते हो।
परन्तु पारिजातिके! शैफाालिके! अगर तुम बुरा न मानो तो मैं अपना प्रेम निवेदित करता हूं। इसमें यह शर्त भी नहीं है कि तुम चांद या सूरज को भूल जाओ। मेरे लिए इतना काफी है कि तुम मेरे सामने खिलोगी। सुनो! एक खुशखबरी है कि राशि के लिहाज से तुम मेरे लिए लकी हो, सौभाग्यदायी हो। मैं सेजीटेरियस हूं…धनु। आज दीपावली है। एक ज्योतिषी अभी-अभी पत्नी को बता गया है कि आपके पति पारिजात का पौधा लगाएं और विष्णु की आराधना करें। लक्ष्मी प्रसन्न होकर दीपावली में धन बरसाएगी।
पारिजातिके!देवताओं ने तुम्हें हमेशा चाहा है। तुम्हारा पौधा रोपने को लेकर कृष्ण की दोनों पत्नियों में भी झगड़ा हो गया था। कृष्ण कहीं से पारिजात का पौधा ले आए। सत्यभामा और रुक्मिणी अपने अपने आंगनों में लगाने की जिद करने लगी। कृष्ण दोनों पक्षों को खुश करने में माहिर। सत्यभामा को तो पौधा दे दिया ताकि पारिजात फूले तो सुबह रुक्मिणी के आंगन में फूलों की चादर बिछ जाए। देखा तुम मनहूस नहीं हो शैफालिके!
पारिजातिके! विष्णु की आराधना और धन की बरसात पर मै बिल्कुल विश्वास नहीं करता। मगर सोचो तो तुम मेरी राशि के लिए शुभ होने से कितनी सुरक्षित हो गई हो। अब चाहकर भी मेरी पत्नी तुम्हें उखाड़ नहीं सकती। तुम्हें न सही मेरे भाग्य को तो वह बचाएगी ही।
•लेखक संपर्क –
•98939 93403
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chhattisgarhaaspaas
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