5 जून पर्यावरण दिवस पर विशेष रचना : प्रकाश चंद्र मण्डल
•पौधे और बच्चे
मैं ने—
बरसात के दिनों में
बोया था एक छोटा सा पौधा
न जाने कब वह पौधा
पेड़ बन गया
बहुत से टहनियां
जिसमें सारे हरे पत्तों में
एक सुखद खुशियां
बिखरने लगी
देखते देखते वसंत आया
टहनियों में शाखाओं में
फूलों का गुच्छा
हंसकर खिलने लगा,
मानो बहुत दिनों से
विरान पड़ी थी
यह बगीयां
हवाएं चलती थी मंद मंद
पर अब चारों ओर
खुशियां ही खुशियां है
हवाएं बहने लगी तेज
क्योंकि फूलों की खुशबू
मादकता भरे
सबको लुभा रही थी।
यह पौधे नुमा बच्चे
एक दिन हमारे आंगन को
किलकारियों से भर देते हैं
धीरे धीरे शिशु से शैशव
शैशव से जवानी
और उसके बाद
निरन्तर चलता रहता है
यह सिलसिला,
मेरी भावनाएं यही नहीं
समाप्त होती
अगर न रुके सांसें
तो हरियाली बचाना है
इसके लिए दो पेड़
अवश्य लगाना है।
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•समय के साथ
बचपन की बहुत सारी बातें
आज भी मुझे याद है
मां कहती थी
पेड़ों से पक्षियों का घोंसला
कभी मत तोड़ना
नहीं तो तू जीवन में
सुखी नहीं हो पाएगा
तकिए के ऊपर नहीं बैठना
नहीं तो फोड़ा निकलेगा
बारिश की फुहार से उगे हुए
कुकुरमुत्ता को नष्ट मत करना
मेंढ़कों को मत मारना
नहीं तो शादी नहीं होगी
पक्षियों के घोंसले तोड़ने से
जीवन में सुख नहीं मिलता है
मां के उन आशंका भरी बातों को
अवहेलना करते हुए
तकियों में बैठना,
जानबूझकर मेंढक मारना
और पेड़ों से पक्षियों के घोंसला
तोड़कर लाता था
बहुत आनंद भी मिलता था
समय के साथ जाना कि-
पर्यावरण को बचाने के लिए
पेड़ों के ऊपर पक्षियों का घोंसला
पृथ्वी एवं घर के सुख एवं सम्मान
के प्रतीक है।
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•संपर्क –
•94255 75471
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chhattisgarhaaspaas
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