पिता दिवस पर विशेष : मेरे काका – सुधा वर्मा [रायपुर छत्तीसगढ़]
🌸 मेरे काका
मेरे काका
हाँ वे मेरे काका थे
भाई बहनों में मुझे ही
कंधे पर बैठाया था।
चार बजे सुबह उठ कर बेल पत्ते
और फूल तोड़ना सिखाया था।
नहाते ही गीता का पाठ करते
मैं द्वार गोबर से लीप कर
रांगोली डालती
फिर हम दोनों पेपर पढ़ते।
सात आठ साल की उम्र में
गोबर और काली मिट्टी के
महत्व को समझाया था।
ये थे काका मेरे, मेरे काका।
जूते पर साथ में पॉलिश करती
छोटे छोटे कामों में हाथ बटाती।
साथ में सोती तो एक ऊंगली
काका की नाभी पर होती
नाभी मेरे लिये अजूबा थी
काका ने सरलता से समझाया
नाभी से ही बच्चा माँ के गर्भ मे
भोजन लेता है।
खेल खेल में
मैने गणित सीखा
धरती पर बनते थे नक्शे
और फिर चलते थे हम
और जाना धरती के भूगोल को।
बेटी होकर कभी रोका नहीं
कभी विचारों को लादा नहीं।
पढ़ाई की मैने मरजी से
खुशी बस इतनी होती थी
बेटी ने नम्बर अच्छे लाये।
गाय तो माँ होती है.
पर सच में काका की माँ थी गाय।
सुबह गोबर उठाने से नहलाने
तक का काम।
शाम को पहले गाय चंदा
फिर बाद में थे सब हम।
ऐसे थे काका मेरे
ससुराल पहुँच जाते थे
काजू बादाम और टोस्ट लेकर
अल्सर था मुझे
तो रात को बार बार उठ कर
मुझे देखा करते
ईश्वर से प्रार्थना करते
और देशी दवाइयाँ बताते।
काका के ईश्वर की आस्था ने
मुझे फिर से खड़ा कर दिया।
पर मुझे देखने को काका नहीं है
सुकुन हैं मुझे
रखा था मैने काका को कुछ साल
अपूर्व ने भी पाया था भरपूर प्यार।
सुबह हनुमान चालीसा
घर में गूंजा करता
हर शाम महामृत्युंजय का
जप होता।
सकारात्मक उर्जा से भरा घर
आज भी काका को याद करता है।
सैकड़ों सीख देकर गये।
सबसे बड़ा था सबकी मदद करना
शिक्षा दान परम दान।
सारा जीवन शिक्षा देते रहे
बहुतों को पढ़ाया नैतिकता सिखाई
जीवन को पढ़ने का तरीका बताया।
सूकून से चले गये शिवधाम
कभी न आने के लिये।
मेरे काका, ऐसे थे मेरे काका।
•संपर्क –
•94063 51566
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chhattisgarhaaspaas
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