- Home
- Chhattisgarh
- कविता आसपास : मनमौजी मन – शुभेंदु बागची [भिलाई छत्तीसगढ़]
कविता आसपास : मनमौजी मन – शुभेंदु बागची [भिलाई छत्तीसगढ़]

🌸 मनमौजी मन
हमने तो कनस्तर से निकाल कर देखा…
कभी कभी एक शाम यूँ संवारकर देखा!
रख दिया पतवार के मौजों की मनमानी है,
मद्धिम रोशनी में वक़्त ने मुस्कुराके देखा..!
के मनमौजी मन बता रहीं है ठिकाना,
खुशियों का दरीचा खुला है, यहाँ देखा!
दुनिया-दार का नज़रिया, के हम नादान..
‘आक़िल’ कोई लम्हों को जो चुनते देखा!
सांसों के दरमियाँ ये सिलसिला है ज़िन्दगी,
हम जिंदगानी का पसारा समेटते हुए देखा!
•दुनिया – दार : पुल्लिंग/संसार के प्रपंच में उलझा हुआ व्यक्ति, संसारी
•आकिल : बुद्धिमान, मेधावी, अक्लमंद, समझदार, ज्ञानी
•पसारा : पुल्लिंग/विस्तार, विशाल, फैलाव
▪️▪️▪️
[ शुभेंदु बागची अंतरराष्ट्रीय प्रवासी बंगाली सांस्कृतिक एवं समाज कल्याण सोसायटी ‘ पुबेर हाओआ ‘ के अध्यक्ष हैं. •’ बंगीय साहित्य संस्था ‘ के महासचिव हैं. •’ पुबेर हाओआ ‘ का मुखपत्र ‘ दण्डक अरणि ‘ वेब पत्रिका के संपादक हैं. •हिंदी, बंगला एवं उर्दू में लेखन कार्य निरंतर जारी है. बहुमुखी प्रतिभा के धनी शुभेंदु बागची की एक नई कविता ‘ मनमौजी मन ‘ ‘ छत्तीसगढ़ आसपास ‘ में प्रकाशित कर रहे हैं, अपनी राय से पाठक अवश्य अवगत करायें, – संपादक ]
•कवि संपर्क –
•62601 48065
🌸🌸🌸
chhattisgarhaaspaas
विज्ञापन (Advertisement)