कविता आसपास : ‘ टेडी बीयर ‘ – पल्लव चटर्जी [भिलाई छत्तीसगढ़]
🌸 टेडी बीयर
हैलो टेडी!
कैसे हो?
जाने कब तुम्हारा साथ छोड़कर
समय की उँगली थामे
बहुत दूर निकल आया-
जान ही न पाया।
अब मैं पहले जैसा भी
नहीं रह गया….
परिस्थितयों के हथौडो़ं ने
बदल दिया है मुझको
भीतर-बाहर से
किंतु तुम… आश्चर्य…
अब भी वैसे ही हो
जैसा छोड़ गया था तुम्हें
मैं तो राम सा नहीं
फिर तुम कैसे अहिल्या हो गये?
आज भी घर के उसी कोने में
काँच घर में बैठे हो-
चुपचाप,शान्त,शिष्ट प्रतीक्षारत पथराई आँखों को लिए
तुम्हें याद है टेडी… तुम्हारे बिना एक क्षण भी रह न पाता था मैं
खाते समय तुम मेरी गोद में होते,
पढ़ते समय मेरी पीठ पर और
सोते समय मेरी बाँहों से-
लिपटे होते थे…
माँ की डपट,पिता की चपत और
टीचर की सबक ने धीरे-धीरे
तुम्हें मुझसे दूर कर दिया।
अच्छा हुआ तुम आबद्ध रहे
अपने काँच घर में
अन्यथा
बाहरी दुनिया की निष्ठुरता,
स्वार्थपरता,अमानुषिकता
और
संवेदनहीनता से उपजा उदासीन भाव देखकर
हमारी सृष्टि पर व्यंग्यं कसते
और अपने टेडी जीवन पर खुश होते।
यहाँ सभी एक दूसरे से
बडा़ होना चाहते हैं-
नैतिक- अनैतिक तरीके़ से
सुख-सुविधाओं का राजसिंहासन पाने की-
होड़ सी लगी रहती है…
प्रेम छद्मवेश में घूमता है।
मेरे लिए तो टेडी-
तुम्हारा मखमली स्पर्श,
तुम्हारा स्नेह,तुम्हारी ममता ही
अनमोल सम्पद है आज भी।
अच्छा हुआ तुमने हमारी दुनिया नहीं देखी वरना-
तुम भी मेरी तरह
अस्थिर हो जाते और अपने अस्तित्व पर
लज्जाबोध होता हर क्षण तुम्हें भी।
•संपर्क –
•81093 03936
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chhattisgarhaaspaas
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