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कुछ जमीन से कुछ हवा से : ‘ नानी की कहानी ‘ – विनोद साव

मैं आ तो गया था यहां एक साहित्यिक समागम में पर मन भटक रहा था अपनी नानी की स्मृतियों में जो मेरे जन्म से पहले इस गाँव की पुत्रीशाला में शिक्षिका रही थीं. यह १९५० से ५५ के बीच का कालखंड रहा होगा.
हम दुर्ग निवासी रहे. हमारे भरे पूरे परिवार में न केवल पिता का पक्ष शिक्षा विभाग में रहा, बल्कि माँ का पक्ष भी. हमारी नानी और नाना दोनों प्रधान अध्यापक रहे. इस गाँव का नाम मगरलोड है.. और यह नाम हम अक्सर अपनी अम्मां से सुना करते थे कि “नानी कभी मगरलोड में रहा करती थी.” यह सुनकर आश्चर्य होता था की आज से सत्तर साल पहले दुर्ग की एक युवा महिला जो तीन बेटियों और एक बेटे को जनने के बाद असमय विधवा हो गई थीं, उसे अकेले नौकरी करने सवा-सौ किलोमीटर दूर जंगल में बसे किसी गाँव में आना पड़ा था.. संभव हो कि यह उनकी शुरुआती नौकरी भी रही हो.. पर इस सुदूर अंचल में उन्होंने कुछ साल बिताए थे. नानी के पति और पुत्र दोनों असमय ही काल के गाल में समा गए थे. हम भाई बहनों ने अपने नाना और मामा को नहीं देखा था. नानी यहां से स्थानांतरित होकर पाटन की पुत्रीशाला चली गई थीं.
अम्मां हमें बचपन में एक ब्लैक एंड व्हाइट फोटो दिखलाया करती थीं जिसमें नाना जी एक ग्रुप फोटो में पगड़ी बांधे बैठे थे. उस धुंधले चित्र में भी वे साफ रंग के गोल मुंह और गोल नाक वाले सहृदयी व्यक्ति दिखते थे. अम्मां का चेहरा नानी की तरह नहीं नाना की तरह था और लोग कहते थे कि मैं अम्मां की तरह दिखता हूँ. परोक्ष रूप में साफ रंग, गोल मुंह और गोल नाक वाला यह ताजगी भरा चेहरा नाना से अम्मां में होता हुआ मुझ तक आ पहुंचा था. अम्मां कहती थीं कि “तू अपने नानाजी की तरह हँसता बोलता है.” नानी अपने बुढ़ात काल की असहज स्थितियों में साड़ी बदलती थीं तब नि:संकोच मेरा सहारा ले लेती थीं क्योंकि उन्हें भी मैं नाना जी की तरह लगता था.
नानी कितनी पुरानी थी लेकिन उनका नाम एकदम नया था : श्रीमती शोभा गर्ग – कितना आधुनिक और चमकदार नाम था नानी का. नाना का नाम सूरत राम गर्ग था जिनसे मेरी सूरत मिलती थी. शिक्षित और सुघड़ नानी पाकशास्त्र में भी निपुण थी. अम्मां ने पूरनपुड़ी, छींट लाडू यानि पूरन लड्डू, कसेर लड्डू जैसे कई दुर्लभ छत्तीसगढ़ी व्यंजन तब नानी और उनकी सहेलियों से सीखे थे. मुझे पहली बार सोने का सिक्का नानी ने दिखाया था. एकदम पीला सुनहरा चमकता हुआ. हम इसे बाजार जाकर सुनार की दुकान से लाए थे. वे मेरे प्राइमरी स्कूल के दिन थे. कहते हैं आजादी के बाद सोने के मूल्य में सबसे ज्यादा गिरावट साल १९६४ में हुई थी. नानी को यह अनमोल रतन बनाने वाला सोना फकत तिरसठ रुपये तोले में मिल गया था. आज नानी होती तो उसके पास रखा वह सोना पचास हजार का होता.
बेमेतरा जिले में है शिवनाथ किनारे नानी का गाँव लावातरा. यह गाँव बड़ा पथरीला था. वहां के सारे मकान पत्थरों से बने थे. ईटों की जगह बड़े बड़े पत्थरों से बने ऊँचे मकान एक अलग छटा बिखेरते थे. इस गाँव पर मैंने एक कहानी लिखी थी ‘तुम उर्मिला के बेटे हो?’ इसे जाने माने संपादक प्रभाकर श्रोत्रिय ने ‘नया ज्ञानोदय’ में बड़े जतन से छापा था. यह कहते हुए कि इस कहानी में एक ‘लिरिकल सौन्दर्य’ है (गीतमय).
एक बार नानी के साथ गाँव के बाजार जाते हुए मेरा पैर पत्थर से टकरा गया था जिसे छत्तीसगढ़ी में ‘हपट’ जाना कहते हैं. तब मेरे दाहिने पैर के अंगूठे के बाद वाली उंगली ‘कनिष्ठा’ का नाख़ून निकल आया था. आज साठ बरस बाद भी उस उंगली का नाख़ून टेढ़ा निकलता है. जब भी कोई मेरे उस नाखून की बात करता है तब अनायास ही नानी की याद आ जाती है.
नानी पर सोचते हुए हम साहित्यकार मित्र बातें करते हुए मगरलोड के एक चौराहे तक पहुँच गए थे. कार रुकवाकर पास ही एक मेडिकल स्टोर्स में बैठे सज्जन से मैंने पूछा “यहां की पुत्रीशाला का पुराना भवन कहाँ था?” तुक्का सही बैठा और वे सज्जन बताने लगे थे. हमने एक ऐसे जानकार और संवेदनशील आदमी को पा लिया था जो हमारी भावनात्मक व्यग्रता को समझ सकता था. वे बताते हुए बाहर आ गए तब मैंने उन्हें कार में बैठकर साथ चलने के लिए राजी कर लिया. वे बेटे की देखरेख में दुकान छोड़कर हमारे साथ हो लिए थे. उनका नाम देवनारायण चक्रधारी है. वे बोलने लगे “यह बाजार चौक का इलाका है. हम गैलेक्सी स्कूल की ओर चलेंगे. बाद में पुत्रीशाला नए भवन में आ गई थी जो अब प्राथमिक कन्या शाला है” हमने देखा उस प्राथमिक शाला के सुसज्जित भवन को.
हम एक क्रमशः संकरे होते हुए मार्ग की ओर चले जा रहे थे जो सत्तर बरस पहले गाँव की पुरानी बस्ती थी. गली में आने जाने वाले ग्रामीण जन कुछ संशय और कौतुहल से हमें देखने लगे थे. चक्रधारी जी के कहने पर हम एक मलबे की ढेर के पास आ खड़े हुए. वे बोले कि ‘यही है वो स्थान है जहाँ मगरलोड की पुत्रीशाला थी. यहां कोई सरकारी भवन नहीं था, एक गौंटिया (समृद्ध किसान) सिन्हा परिवार का बाड़ा गोर्रा था. इसी बाड़े में पुत्रीशाला लगा करती थी. यह कलार पारा है जहाँ सिन्हा परिवार आज भी है और उनका यह बाड़ा कई बार टूट बन चुका है.”
मैं भावनाओं से भरा देखता हूँ उस स्थान को जहाँ सत्तर बरस पहले एक युवा शिक्षिका घर से बहुत दूर जंगल के इस सुदूर क्षेत्र में अपनी पदस्थापना में आई होगी. अपनी नौकरी के आरंभिक संघर्षों के साथ यहां जीवन को किसी तरह बिताया होगा. मैं कलार पारा की संकरी गलियों में आ जा रहे कुछ वृद्धों को देखता हूँ और सोचता हूँ क्या इनमें से किसी ने हमारी नानी बनी उस युवा शिक्षिका शोभा गर्ग को यहां देखा होगा.
[ चित्र : एल्बम में नानी का एकमात्र चित्र. दूसरे सबसे नीचे चित्र में पुन्नीशाला की वह जगह दिखाते हुए देवनारायण चक्रधारी. ]

•लेखक संपर्क –
•90098 84014
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chhattisgarhaaspaas
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