कविता आसपास : डॉ. मंजुला पांडेय [हल्दवानी, जिला – नैनीताल, उत्तराखंड]
🌸 मेरे अपने
भागता रहा जिंदगी भर
तलाशता रहा सुकून
चला गया दूर बहुत दूर
छोड़कर शांत एकांत
प्रकृति का साथ
उड़ते घनेरे बादल
हरे-भरे वृक्ष
सम्मोहित करती प्रकृति
कभी बड़े अरमानों से
बनाया आशियाना
पर भुला नहीं पाया
इन्हें कभी भी
सुनी नहीं कभी मैंने
अपने मन की
बस लगा रहा ताउम्र
ख्वाहिशें पूरी करने में
घर परिवार की
कर दिया बस दरकिनार
अपनी चाहतों को, जरूरतों को
प्यार जो करता था
जकड़ा जो हुआ था
मोह माया के बंधन में
पर नहीं, वह सब
एक छलावा था, भ्रम था
जिसके गहरे कूप में
गिरा हुआ था मैं
दिखाई नहीं देता था
जहां मुझे मेरे
अपनों का अक्स
हां चले गए सब
छोड़कर जब मेरा साथ
खुशी की तलाश में
समझ आया मुझे तब
बहुत देर बाद
साथी जो थे मेरे अपने
हुए नहीं थे कभी मुझसे दूर
आज जब बैठता हूं
अपने ही घर के आंगन में
करता हूं बातें अपने आप से
पाता हूं खुद को
अपनों के ही बीच में
झूमते गाते वृक्ष
शीतल बहती मंद समीर
अनंत आकाश धरती
घेर लेते हैं मुझको
कहते हैं मुझसे
चीख चीखकर
नहीं होंगे हम
जुदा कभी तुझसे
देंगे साथ तेरा
अंतिम सांस तक
आखिर हम ही तो हैं
तेरे जीवन के आधार, तेरे प्राण….।
•संपर्क –
•98977 30103
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chhattisgarhaaspaas
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