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- विशेष : हलषष्ठी 5 सितम्बर : जल संचयन का पर्व : यह पर्व संतान के स्वास्थ और सुख की कामना के लिए मनाया जाता है ‘ हलषष्ठी ‘ – श्रीमती वर्षा ठाकुर, प्राचार्य, शा. उ. म. विद्यालय, जुनवानी भिलाई दुर्ग
विशेष : हलषष्ठी 5 सितम्बर : जल संचयन का पर्व : यह पर्व संतान के स्वास्थ और सुख की कामना के लिए मनाया जाता है ‘ हलषष्ठी ‘ – श्रीमती वर्षा ठाकुर, प्राचार्य, शा. उ. म. विद्यालय, जुनवानी भिलाई दुर्ग

हलषष्ठी : हमारे छत्तीसगढ़ में कई त्यौहार और पर्व मनाया जाता है । जिनको मनाने के पीछे एक विशिष्ट सन्देश छिपा होता है ।।
इन्हीं में से एक पर्व है *खमरछठ (हलषष्ठी ) । यह त्योहार भादों माह के कृष्ण पक्ष के षष्ठी तिथि को मनाया जाता है ।
हलषष्ठी के दिन ही हलधर याने कि भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम जी का तथा राजा परीक्षित का जन्म हुआ था । यह पर्व संतान के स्वास्थ और सुख की कामना के लिए किया जाता है । इस दिन माता व्रत रखती है । ऐसी मान्यता है कि जिन दम्पत्तियों का संतान नहीं हैं यदि वे भी पूरे मन से यह व्रत करें तो उनकी मनोकामना जरूर पूर्ण होती है ।संतान की प्राप्ति होती है ।

यह पर्व अपने में कई सन्देश समेटे हुए है ।
हलषष्ठी का पर्व पर्यावरण के दृष्टिकोण से बहुत ही महत्वपूर्ण है ।यह पर्व जलसंग्रहणका संदेशदेता_पर्व _है ।
इस पर्व को मनाने के लिए कच्ची जमीन (मिट्टी वाली) पर सगरी खोदा जाता है । सगरी बनाने के लिए जमीन पर दो छोटे गढ्ढे खोदे जाते हैं दोनों गढ्ढो को आपस में जोड़ दिया जाता है । ताकि इनका जल आर-पार हो सके । सगरी छोटे तालाब का प्रतीक है ।
पूजा करते समय सर्वप्रथम सभी माताएँ सगरी में छः-छः लोटा जल दोनों ओर डालती है । याने की 12 लोटा जल । कल्पना करिए बस्ती की हर माता इसी तरह से 12 लोटा जल डालती हैं तो जमीन के भीतर कितना जल संग्रहित हो जाता है । सगरी में जल डालने का कार्य माताओं के साथ वहाँ उपस्थित सभी बच्चे और श्रद्धालु जंन भी करते हैं ।
सगरी में जल डालने का कार्य वास्तव में हमें भू- जल संग्रहण का
सन्देश देती है । ये बताती है कि हमें जल का उपयोग करने के साथ साथ उसका संचयन भी करना है ।
सगरी के दोनों गढ्ढे आपस में जुड़े होते हैं जिसमें जल आर-पार होता है । जो जल प्रबन्ध का संदेश देती है । ये इस बात का प्रतीक है कि किसी जगह यदि वर्षा जल अधिक है तो हम उसे कम जल क्षेत्र की ओर ले जाएं ।
इस पर्व से जुड़ी सभी कहानियों में मुख्या के द्वारा बस्ती में तालाब खुदवाने की चर्चा है ।जो बताता है कि प्राचीन काल में तालाब खुदवाना बड़ा पुण्य का कार्य माना जाता रहा है । याने जल संग्रहण की परंपरा रही ।

इसकी दूसरी खास विशिष्टता यह है कि आज के दिन व्रत रखने वाली माताएं पसहर चावल का भात और छः प्रकार की भाजी का भाजी बनाती हैं और इसी का फरहार करती हैं । भाजी हाथ से तोड़ा जाता है ।इसे तोड़ने या काटने के लिए हँसिया या चाकू का प्रयोग नहीं किया जाता । जो बताता है बिना साधन के या कम साधन में भी हम बेहतर कर सकते हैं ।
छः प्रकार की भाजी को मिला कर बनाना याने की भोजन की पौष्टिकता को बढ़ाना । भाजियां वैसे भी पौष्टिक तत्वों से भरपूर रहती है । ये वनस्पति से जुड़ाव और उसके पहचान को भी इंगित करती है । भाजियों में विशेष रूप से – जरी , चेंच , पोई ,कुम्हड़ा ,मुनगा , बरबट्टी भाजी , करेला , या स्थानीय रूप से उपलब्ध भाजियों का उपयोग किया जाता है ।
हल चले जमीन के अन्न का सेवन नहीं करती है ।साथ ही गाय के पूजन के कारण गाय के दूध ,दही और घी का उपयोग न कर भैंस के दूध ,दही ,घी का उपयोग करती हैं ।
पसहर चावल एक विशेष प्रकार का चावल है जो खेतों में नहीं उगाया जाता है ।ये स्वतः ही डबरों में अपने आप उगता है ।जिसे एकत्रित किया जाता है । ये लाल रंग का होता है । बहुत ही पौष्टिक और स्वादिष्ट होता है ।
इस पर्व की तीसरी खास बात है कि संतान की सुख की कामना के साथ जीवों और प्रकृति से भी प्रेम करना सीखाती है ।साथ ही पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देती है ।
माताएं पूजा के पश्चात, “छह रंगों के कपड़ो से बने पोथी” को अपने संतान के पीठ के बाये ओर छह बार मारती है और प्रसाद देती है। संतान के स्वस्थ और दीर्घायु होने की कामना करती हैं
खम्हार या महुआ के पत्ते से बने पत्तल में माताएं फरहार करती है । स्वयं अन्न ग्रहण के पूर्व अपने भोजन में से छः हिस्सा निकालती हैं -पहला हिस्सा *बेटी के लिए , दूसरा *जल देवी के लिए , तीसरा *गऊ माता के लिए , चौथा *पक्षी केलिए , पांचवाँ *बिल्ली और छठवां *कुत्ते के लिए ।
ये परम्परा हमें सन्देश देती है कि हमारी कमाई पर केवल हमारा हक ही नहीं बल्कि हमारे संतान के साथ- साथ उन सभी जीव जंतुओं का भी है ,जो हमारे जीवन को सुगम और सुखमय बनाने में सहायक है ।
इस पर्व की चौथी खास बात है कि इसमें पूजा सामूहिक रूप से किया जाता है । इससे अपनों से मेल-मिलाप का अवसर मिलता है । आपसी सदभावना और प्रेम बढ़ता है । किसी के पास कोई सामान नहीं तो माताएँ आपस में सामान साझा करती हैं ।
आज आधुनिकता के दौर में हम अपने पारंपरिक अनाजों जो कि सस्ता ,सुलभ और पौष्टिकता से भरपूर होती है भूलते जा रहे हैं । इस पर्व के माध्यम से हम उनसे भी परिचित होते हैं ।
इस पर्व की एक और विशेषता इसमें पूजा के दौरान खम्हार के पत्ते से बने छः दोनों में लाई ,महुआ , चना, मुन्नका ,ज्वार ,गेहूं का मिश्रित प्रसाद चढ़ाया जाता है । जो कि पौष्टिकता से भरपूर होती है । यह प्रसाद हमें हमारी पारंपरिक अनाजों को जानने का अवसर देती है । साथ ही उसके स्वाद से परिचित भी कराती है ।
एक और खास बात ,इस दिन व्रत रखने वाली माताएं टूथ पेस्ट के स्थान पर खम्हार या महुआ का दातुन करती है । निश्चित ही ये दातुन दांतो को मजबूती प्रदान करती है । आज विदेशों में हर्बल ब्रश के नाम पर महंगे दामों में दातुन बिक रहे हैं । हमारे लिए ये सर्व सुलभ है तो हम इसकी कदर नहीं करते ।
पर्व और त्यौहारों की विशिष्टता यह है कि इनसे आध्यात्मिक शांति ,ऊर्जा मिलती है ,साथ ही ये जीव मात्र से प्रेम करना सिखाते है । प्रकृति से जुड़ाव भी बढ़ता है ।पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी मिलता है । आपसी सदभाव बढ़ता है ।
इन त्यौहारों के चलते बहुत सारे लोगों को जीविकोपार्जन का अवसर मिल जाता है ।
त्यौहारों से जुड़े बहुत सारी लोककथाएं प्रचलित हैं । हलषष्ठी के दिन छः कथा सुनी और सुनायी जाती है।

हर कथा में तालाब का उल्लेख जरूर होता है. कथाओं की चर्चा फिर कभी…
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