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- हास्यव्यंग्य : ‘ अफवाह का सच से सामना ‘ – दीप्ति श्रीवास्तव [ चौहान टाउन, जुनवानी, जिला – दुर्ग, छत्तीसगढ़ ]
हास्यव्यंग्य : ‘ अफवाह का सच से सामना ‘ – दीप्ति श्रीवास्तव [ चौहान टाउन, जुनवानी, जिला – दुर्ग, छत्तीसगढ़ ]
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अफवाह का सच से सामना
यूं तो बातें बनती बिगड़ती रहती है परन्तु बिगड़ी बात में और नमक मिर्च हींग का तड़का लगा बघार बना देते हैं और जिसकी खुशबू चहुं दिशाओं में फैलने लगती है लोगों को स्वाद आने लगता है चटकारे ले लेकर पान ठेलों , चौराहे पर चर्चा करने लगते हैं तब समझ लिजिए तड़का अफवाह में बदल गया है तभी तो रसास्वादन करने चौराहे पर जनता जनार्दन छक कर बखान कर रही है जबकि बात की सत्यता की परख किसी ने नहीं की जैसे की मुहावरा है कौवा कान ले गया । लोगों को अपना कान देखने की फुर्सत नहीं बस ले गया ले गया मेरा कान की रट लगाते बैठते हैं और दूसरों को बताते फिरते हैं मुआ कनवा काला कौवा मेरा कान ले गया और मैं कुछ कर नहीं पाया यदि सामने वाला कह दे की कान तो आपके शरीर से लगा यानि चिपका है तो उनको अपनी तौहीन लगती है कि मेरी बात को मान नहीं रहा है अरे भैया तुमसे सच्चाई किसने पूछी है तुम्हें तो हां में हां मिलाना है न कि हमारी बात का विश्लेषण करना । उसके लिए बैठे हैं न विपक्ष के लोग।
शहर में अफवाह फैली फलांने भैया को चुनाव टिकट मिलना पक्का है । यह खबर किसने और कब और किस उद्देश्य से उड़ाई मालूम नहीं या तो चम्मचों ने उड़ाई अथवा फलांने भैया ने चमचों द्वारा उड़वाई कहना मुश्किल है । जाने किसकी नियत क्या है किसकी नियत में खोट है । यह तो वही जान सकते हैं । धुत के पासे जब मामा शकुनि फेंकता तब वह उसके इशारों पर नाचते ।अब यहां इस चुनावी दंगल में पासे किसके हक में नाचेंगे कहना अभी से क्लिष्टकारी है वरना बाद में हम पर ही कहर टूटेगा । बड़े आये थे भविष्यवाणी करने ।
अब लिस्ट निकलने में नाम का कयास तो क्या दूर दूर तक नाता नहीं टिकट मिलने का । अजी हम कौन से तीसमार खां है या किसी विशेष के कृपा पात्र अथवा अथाह अपार संपत्ति के मालिक या किसी बड़े घर सम्बन्ध रखने वाले । फिर अपनी उम्मीदवारी की कल्पना कर अफवाह उड़वा संतुष्ट होने की प्रवृत्ति को क्या बुरा बोलेंगे । मन का हो नहीं सकता तो क्या मन का कर भी नहीं सकते बिना किसी को नुक़सान पहुंचा कम से कम संतुष्ट तो हो गया हमारा मन चर्चा में लोगों की जबान पर तो चढ़ा हमारा नाम । अफवाह उड़वा कोई फांसी का हकदार तो नहीं होता।
अरे भैया हमारे नाम पर चर्चा चली जरूर थी यह सौ आना सत्य है हमसे भारी पड़ गये जिन्हें टिकट मिला उनका कद तो हमसे कई गुना बड़ा है और हमसे पुराने खिलाड़ी भी हैं हम तो इतना चाहते हैं हमारी वजह से किसी को नुक़सान न हो ।अगर हमें चुनते भी तो हम उनके पक्ष में अपना नाम वापस ले लेते । सीनियर की इज्जत हम आज करेंगे तब ही कल जूनियर हमारी इज्जत करेंगे ।
अफवाहों का धुंआ छंट चुका सच से सामना हो गया क्या दर्पण में देखने से अपना अक्श स्वयं को कभी गुमराह करता है नहीं ना बस अब सत्य जानने का समय आ गया हमारा नाम टेबल पर रखा जरूर गया था विचार भी किया तथापि कमजोर कड़ी भी पकड़ आ गई । वह इतनी भारी पड़ेगी कैरियर पर मालूम न था । पांच साल पीछे कर दी हमारी इस आदत ने ।अब मलाल करने के अलावा कोई रास्ता नजर नहीं आता । सच कितना निखरा निखारा होता है । जब अफवाह और सच चौराहे पर मिलते हैं तब अफवाह सिर झुकाए बाजू से कटने की फिराक में होती है। अपने किये की शर्मिन्दगी पर नहीं अपितु स्वयं को स्थापित न कर पाने के मलाल में । यह है आधुनिक की चाल कहते हैं ना समय बदल रहा है सच में समय बदल रहा है।
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संपर्क : 94062 41497
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chhattisgarhaaspaas
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