कविता आसपास : डॉ. प्रेम कुमार पाण्डेय [केंद्रीय विद्यालय, वेंकटगिरि, आंध्रप्रदेश]
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अस्तित्व
पतझड़ आएगा
आएगा अवश्य
शाख- पात होंगे विलग
हवाएं ले जाएंगीं बहुत दूर।
दो ठूंठ बतियाएंगे
हरियाली विहीन
प्रकृति की क्रूरत लहराएगी
और एक दिन शुरू होगा
अकेले ठूंठ का संघर्ष
रेगिस्तान में
वह भी ढहेगा ज़रूर
नमी विहीन हवाओं के थपेड़ों से।
नई पौध
आंखों पर पट्टी बांधे झूमेगी
मुकम्मल बोध के साथ कि
वे ही हैं एकमात्र मालिक
इस धरा के।
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न्याय का घंटा
घंटा घनघनाया
दरवान आया
फरियादी ने कहा
राजा को बुला दो
दरवान हुंकारा
हुजूर ध्यान पर हैं।
घंटा….. फिर टनटनाया
सेनापति आया
राजा से मिलवा दो
राज्य पर छाये
संकट को टलवा दो
अंतरंग ने फ़रमाया
नाथ समाधि में हैं।
जनता आई
घंटा हिलाई
राजा को बुलाओ
हाहाकार दिखाओ
प्रहरी अकड़ा
राजा मौन व्रत पर हैं।
मंत्री आया
घंटा न पाया
चिल्लाया
उखाड़ गया न्याय
बुलाओ बुलाओ
अकाल है
जनता भूखी-नंगी
बदहाल है
न्याय का घंटा भी
उखाड़ दिया
बुलाओ बुलाओ
दरवान गरजा चो sssओप
राजा नवरात्रि पर
निरजला व्रत हैं।
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गिद्ध की आँखें
सूने
आसमान में
मडराती हैं
गिद्ध की आंखें.
निर्मिमेष
ढूंढती हैं
पृथ्वी पर
मरा हुआ मांस.
इन
स्केन करती
आंखों का भी
होता है धर्म
कभी नहीं बैठतीं
जिन्दा लाशों पर.
निहायत
क्रूर आंखों में भी
होता है
अपार धैर्य
करती हैं इंतजार
सांसे टूटने का
भूख के बाद भी.
धैर्य और इंतजार से
लबरेज
ये आंखें
आंखों में आंखें डालकर
बहुत कुछ कहती हैं
हमसे
क्या राजपथ के राही
सुन रहे हैं??
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कवि संपर्क : 98265 61819
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chhattisgarhaaspaas
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