कहानी : ‘ इंसानियत ‘ – सुधा वर्मा [ रायपुर छत्तीसगढ़ ]
नीलिमा और राजेश रायपुर के नये बने कालोनी में रहते थे। कालोनी बहुत बड़ी थी। कुछ सेपरेट मकान थे साथ में ही मल्टीस्टोरी बिल्डिंग भी थी। गेट एक ही था। वॉचमैन एक ही था क्योंकि गेट एक ही था। बहुत साफ सुथरी जगह थी क्यों न हो चार बेडरुम तक के बड़े बड़े फ्लेट थे। और आठ हजार रुपये मेंटेनेंस चार्ज था हर माह का।
कालोनी में छोटा सा शंकर जी का मंदिर था साथ ही हनुमान जी भी थे। महिलाये रोज सुबह तो पूजा करके चली जाती थीं पर शाम को सब साथ में मिलकर भजन वैगरह गाती थी। तीज त्यहार सब मिलकर मनाते थे। गणेश और दुर्गा के समय रोज रात का भोजन सामूहिक ही होता था।
किसी के बच्चे विदेश में रहते हैं तो किसी के दूसरे शहर में रहते हैं। उनके लिये यह बहुत सुर्क्षित जगह है। कुछ यंग लोगों के परिवार भी हैं जो यहाँ नौकरी के लिये आये हैं या फिर कुछ धंधा करते हैं। जो बुजुर्ग रहते हैं उन्हे इन भच्चों के साथ अच्छा रगता है तो बच्चों को बुजुर्गों के साथ अपने पालकों का अनुभव होता है।
वॉचमैन गिरधर के परिवार में बस उसका एक बेटा ही है। उसकी पत्नी का निधन कैंसर से हो गया था। गिरधन का बेटा संजू शाम को स्कूल से आने के बाद अपने पापा के पास आ जाता था। वहीं पढ़ता था। आठ बजे रात को अपने पापा के साथ घर जाता था। नौवीं में पढ़ रहा था। आते जाते कोई उसकी पढ़ाई के बारे में पूछ लेते थे।
राजेश गणित के शिक्षक थे। अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं। वे कभी कभी रूक कर संजू क्या पढ़ रहा है यह देख लेते थे। राजेश ने कहा कि गणित और साइंस तुमको जहाँ भी समझ न आये मुझसे पूछ लेना। संजू कभी कभी फोन से समय लेकर राजेश से पढ़ लिया करता था। निलिमा का मन उस बच्चे में लग गया। निलिमा की दो बेटियाँ थी जिनकी शादी हो गई थी और बच्चे भी थे। वे लोग विदेश में रहते थे। यहाँ पर ये दोनों अकेले ही थे।
इस दीवाली पर संजू के लिये कपड़े भी सिलवा दिये थे। गिरधारी को अपना गर्म कोट दे दिये थे। गिरधारी को लगता था कि कितना एहसान कर रहे हैं। मैं तो कुछ कर ही नही सकता।
जब भी गाड़ी गेट पर आती तो गेट खोलना था। जो भी नये लोग या मिलने भी आये हैं तो उसकी जानकारी देता था जब लोग बोलते की भेज दो तब वह भेजता था। कौन है और कौन बाहर गये हैं इसकी पूरी जानकारी रखता था।
जब संजू बारहवीं में था तब सँकूल से घर आते समय उसका एक्सीडेंट हो जाता है। कार उसे ठोकर मार कर निकल जाती है। उसका घर और यह काम्पलेक्स रिंग रोड पर ही थे। गिरधारी को संजू का दोस्त फोन करता है। गिरधारी छुट्टी के लिये नीलिमा से बात करता है। नीलिमा उससे पूछती है तो वह बताता कै संजु का एक्सिडेंट हो गया है।नीलिमा उससे कहती है कि हम लोग देखकर आ रहे हैं तुम यहीं रहो।
राजेश और नीलिमा अपनी कार निकालते हैं और रोड.में जाकर देखते हैं। तब तक किसी ने फोन कर दिया था तो पुलिस भी आ गई थी। संजू को ठोकर मार कर ट्रक आगे बढ़ गई तब उसने ट्रक का नम्बर देख लिया था। खून तो नहीं निकला था पर वह उठ नहीं पा रहा था। पुलिस से बात करके और गिरधारी को फोन पर बता कर उसे पास के अस्पताल में ले जाते हैं।
संजू की पूरी जांच करने के बाद उसे सीटी स्केन के लिये बोलते हैं। उसे सीटी स्केन के लिये ले जाते है। वह खड़े ही नहीं हो पा रहा था। स्केन होने के बाद रिपोर्ट लेकर वे लोग अस्पताल जाते हैं। रिपोर्ट देखने के बाद डा. बताते हैं कि इसकी कमर की हड्डी टूट गई है। प्लास्टर लगाना पड़ेगा। 15.दिन के बाद निकलेगा फिर देखेंगे। यह सारी बाते राजेश गिरधारी को बताता है। गिरधारी चुप ही रहता है।
राजेश प्लास्पर लगवाकर गिरधारी के घर उसे छोड़ने जाता है। गिरधारी हाथ जोड़कर रोने लगता है। साइकिल को संजू के दोस्त लोग ले गये थे।
“यह अच्छी बात है कि अभी दिसम्बर चल रहा है। परीक्षा मार्च में है अभी समय है। ठीक हो जायेगा।”
“हाँ साहब ,आपने बहुत मदद की। आपकी कार थी तो आप लाना ले जाना कर दिये। साहब कितना खर्च हुआ है बता देंगे।”
” देखो गिरधारी पैसे की बात मत करना। यह इंसानियत है। मैनें मदद की क्योंकि तुम दिनभर बारह घंटे हमारे लिये खड़े रहते हो।”
” यह तो मेरी ड्यूटी है साहब ”
” ड्यूटी तो ठीक है पर ड्यूटी के प्रति ईमानदारी भी तो होनी चाहिये। जो तुममें है। यही कारण है कि मैने तुम्हारे लिये यह सब किया गिरधारी। अपनी ईमानदारी बनाये.रखना।”
” जी साहब, अब तुमको 15 दिन की छुट्टी देने के लिये बात करता हूँ। कल से मत आना।”
” जी साहब , जैसा आप लोग सोचें ,मेरे घर में तो कोई नहीं है। सब मुझे ही देखना है।”
” हाँ और आगे के लिये एक बात बताना चाहता हूँ कि इसके पूरे कालेज की पढ़ाई का खर्च मैं करूंगा। तुम कुछ मत सोचो, आराम करो।”
” जी साहब ”
राजेश और नीलिमा अपने घर चले जाते है। गिरधारी अपने बेटे को लिटाता है। संजू से कहता है….. संजू इंसानियत क्या होती है यह मैने देखा। कौन बड़े लोग है जो हमारे जैसे छोटे लोगों की मदद करते हैं।
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