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अपनी बात : ‘ प्रश्न शेष है…’ कृतिकार, इंदुशंकर मनु

मैं विजय वर्तमान बोल रहा हूँ. मेरे मोबाइल पर… आवाज आती है. शहर के विभिन्न साहित्यिक आयोजनों में विजय वर्तमान से मुलाकात हो जाती है. मुझे ख्याल नहीं आ रहा है कि वे मुझसे कभी फोन में बात किए होंगे, खैर..
मैंने उन्हें बताया कि मैं विगत 2 माह से बेड पर हूँ, एक्सीडेंट हुआ है. उन्होंने मेरा पता पूछा, थोड़ी ही देर में विजय वर्तमान, इंदुशंकर मनु, ऋषि गजपाल और कामरेड व्ही.एन. प्रसाद राव घर आ गए.
हालचाल पूछे और इंदुशंकर मनु ने अपनी नई कृति गीत संग्रह ‘ प्रश्न शेष है…’ मुझे भेंट करते हुए 28 नवम्बर को विमोचन कार्यक्रम का सादर आमंत्रण देते हुए बोले, आपको कार्यक्रम में आना है. मैंने हामी भरते हुए कहा, जरूर.
‘ प्रश्न शेष है…’ मैं पढ़ रहा हूँ. कुछ गीत जो मुझे प्रिय लगे, उन गीतों को आज ‘ छत्तीसगढ़ आसपास ‘ के वेब पोर्टल में पाठकों के लिए प्रकाशित कर रहा हूँ -प्रदीप भट्टाचार्य
•इंदुशंकर मनु –
क्या रामायण अधूरी है? क्या वह कभी पूरी होगी? प्रश्न शेष है –
में गीतकार ने अपने वक्तव्य में लिखा है, में से कुछ बातें-
लक्ष्मण रामानुज थे. वे राम के साथ वन को चले गये, लेकिन क्या उर्मिला के पास जाकर औपचारिक बिदाई ली. प्रमाण नहीं मिलते.
ऐसे कई प्रश्न शेष है – इस संग्रह में
क्या हमारे काव्यशास्त्र में वर्णित नौ रसों में से विरह के अतिरिक्त कोई अन्य रस गीत के अद्भव का कारण नहीं हो सकता?
प्रश्न शेष है –
छंद रचने के लिए,
पहला चरण भी चाहिए.
फूल खिलने के लिए,
वातावरण भी चाहिए.
लाज ढ़कने के लिए,
इक आवरण भी चाहिए.
गीत गाने के लिए,
इक आचरण भी चाहिए.
‘प्रश्न शेष है…’ में कथाकार विजय वर्तमान ने लिखा है-
साहित्य का कोई नवजिज्ञासु यदि मुझसे पूछे कि ‘ गीत ‘ किसे कहते हैं, तो मैं गीत के एकेडेमिक्स में जाने के बजाय यह किताब उसे दूंगा और पूरे विश्वास के साथ कहूंगा कि इस संग्रह को पढ़ लें और गुनगुनाने लें. समझ जाओगे कि गीत किसे कहते हैं.
‘प्रश्न शेष है… ‘ में प्रकाशित गीतों को पढ़ने और तरन्नुम में गाने से एक विशेष वातावरण की रचना होती है. हम एक विशेष संसार में पहुँचते हैं. एक उपलब्धि का एहसास होता है.
मुझे लगता है, आज के पद्य संसार में गीतों की एक किताब का आना जरूरी था. इंदुशंकर मनु की कृति ‘ प्रश्न शेष है…’ सही समय में आकर गीतों के ऐतिहासिक और समकालीन
महत्व को स्थापित कर रही है.
पद्य प्रेमियों के लिए यह मनु जी की तरफ से ‘ तोहफा ‘ है.
•प्रख्यात आलोचक प्रो.सियाराम शर्मा ने लिखा है -‘सत्य की अमरता का गायन ‘ –
‘ प्रश्न शेष है…’ इस संग्रह के गीतों में देश और राष्ट्र सर्वोपरि है और आजादी सर्वोतम मूल्य. सर्वधर्म समभाव, धर्मनिरपेक्षता, सांस्कृतिक विविधता इस राष्ट्र प्रेम और देश – प्रेम की धुरी है. देश – प्रेम और राष्ट्रप्रेम पर केंद्रित अधिकांश गीतों में कवि देशभक्त स्वतंत्रता सेनानियों और बलिदानों की समृद्ध परंपरा से जुड़ता है.
संग्रह के कुछ गीतों में देश अमूर्त रह गया है, पर इसमें ऐसे गीत भी शामिल हैं, जिनमें कवि सामा
न्योन्मुख देश – प्रेम, देश के भूखे, नंगे, शोषित, उत्पीड़ित आम जन के प्रेम में तब्दील हो जाता है. इत्यादि जनों के प्रति प्रेम ही इन गीतों को विशिष्ट बनाता है.
‘ यह मेरा भारत देश नहीं ‘ जैसे गीतों में कवि देश और राष्ट्र के अंतर्विरोधों को सही परिप्रेक्ष्य में पहचान पाता है और आदर्श तथा यथार्थ के बीच की खाई का जायजा लेता है. इस उत्तर सत्य के दौर में कवि ‘ सत्य की अम रता ‘ का गायक है. समर्पण, त्याग, बलिदान यहां सर्वोच्च मानवीय मूल्य हैं. पुराने, जर्जर को तोड़कर नया कुछ गढ़ने और बनाने की जिद है.
इन गीतों के लय और प्रवाह में सहज स्वाभाविकता है. तुकों का आग्रह भी है. ये गीत किसी न किसी को संबोधित भी हैं. गीतकार का प्रतिपक्ष हमेशा मौजूद रहा है. ये अपर पक्ष को संबोधित गीत हैं. इनमें प्रश्ना कुलता भी है. प्रश्न स्वयं से भी है और सत्ता और व्यवस्था से भी.
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‘प्रश्न शेष है’ में प्रकाशित गीत/शीर्षक –
परिचय दो/प्रश्न शेष है/कण-कण को पूजा/ना पाँवों ने धरती पायी/पनघट रीत गया/चिंतन का इतिहास अधूरा/बीज का अंकुर हरा है/रामायण कब लिखना ही था/रुकता नहीं है पहिया/इसी लिए अपराधी है/कालचक्र का
प्रत्यावर्तन/ओ बसंत फिर आना/निर्माणों की बात बड़ी/जिंदगी तो यज्ञ थी/अभिनय के आयाम नये/सत्य अमर है/खड़े कई सवाल हैं/विघटन का यह चक्र/झूठे सारे शब्द कोष हैं/मत सांझ उतर मेरे अंगना/लेखनी री! धन्य कर लूँ/हो मेरा हमसफर जिंदगी/सब हृदय का द्वार खोलें/गाँधी युग वरदान/इनकी अमर कहानी/आओ, राजतिलक कर दें/इक निशानी बन गए हो/देश की रक्षा काम बड़ा/अब क्या होगा/यह मुझे विश्वास होगा/रह जाये ना कहीं अधूरी/यह मिलन मधु यामिनी/हैट लगाकर गुड़िया मेरी/छत्तीसगढ़ अब पृथक करो और यह मेरा भारत देश नहीं.
[ कुल 35 गीत है ]
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प्रश्न शेष है
परिचय यह क्या सही रहा,
अस्तित्व आज बस यही रहा
अंतर मेरा पूछ रहा है
नहीं पंथ पर सूझ रहा है
जीवन में यह प्रश्न शेष है.
परिभाषा का कौन वेश है,
उपालंभ है यह जीवन का
या निर्णय है अनुशीलन का
जिजीविषा की जिज्ञासा है
सच सुनने की अभिलाषा है
व्यवहार मेरा क्या कुटिल रहा
या मेरा पथ भी जटिल रहा.
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परिचय दो
आश्वासन तुमने दिये बहुत,
अब हमको कोई निश्चय दो.
तुम सदा मनाओ सालगिरह,
हमको भी इक परिणय दो.
मत द् वार दिखाओ वैभव का,
मत हमको कोई संचय दो.
पर जिसकी मूरत तोड़ रहे,
उस कलाकार का परिचय दो.
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खोज रहा था उन राहों को,
जो मंजिल बन जाते हैं.
पूज रहा था उन पाँवों को,
जो साहिल बन जाते हैं.
उन फूलों से प्यार किया था,
जो सौरभ बन जाते हैं.
उन किरणों की, की अगुवानी,
जो सूरज बन जाते हैं.
इन राहों ने दिशा बदल दी,
पाँवों ने हठधर्मी की.
इन कलियों के पंख नूचे हैं,
किरणों ने बेशर्मी की.
ना भावी साम्राज्य मिला और,
नहीं अतुल इतिहास दी.
ना पाँवों ने धरती पायी,
ना सर को आकाश दी.
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रुकता नहीं है पहिया
रुकता नहीं है पहिया,
इस काल की धुरी का.
यह चल दिया दिसम्बर.
आगम है जनवरी का.
इक है विहान प्रात:
इक अस्त साँझ बेला.
इक जुड़ रहा है तीरथ,
इक उठ रहा है मेला.
खिलते कली को अर्पण,
उपहार पंखुरी का.
यह चल दिया दिसम्बर,
आगम है जनवरी का.
इस काफिले को छोड़ो,
धूमिल हुई रवानी.
खाली करो सिंहासन,
आती नई जवानी.
बंद मुठिठयां खोलो,
अरमान अंजुरी का.
यह चल दिया दिसम्बर,
आगम है जनवरी का.
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कण – कण को पूजा
कण-कण को पूजा, रूप दिया
इस पर्वत ने ठुकराया है.
मैं बहा पसीने बूंद झरा,
इस सागर ने तरसाया है.
किरणों को रूप दिया मैंने,
इस सूरज ने बिलखाया है.
कलियों में गंध भरे मैंने,
इस उपवन ने बिखराया है.
मैं बना सीड्रियां हार गया,
यह नील – गगन बढ़ जाता है.
मेरी साँसों की खुशबू पर,
यह मलय पवन चढ़ जाता है.
मन चातक सा विश्वासी था,
यह चाँद मगर बईमान हुआ.
श्रद्धा के मैंने सुमन दिए,
यह कलयुग का इंसान हुआ.
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▪️ इंदुशंकर मनु
6 जनवरी 1947 को जन्में मनुजी हिंदी, समाजशास्त्र और लोकप्रशासन में एम. ए. की शिक्षा प्राप्त की. आकाशवाणी से कविताएं एवं कहानियां प्रसारित. 1980 से 1987 तक नियमित रूप से आकाशवाणी से ‘ आज का चिंतन ‘ का प्रसारण. मनुजी 5 दशक से अधिक प्रगतिशील कवि के रूप में स्थापित हैं.
• संपर्क –
• 940 764 5464
▪️ स्व.पिताश्री रामसिंह मनु को समर्पित ‘ प्रश्न शेष है…’ वैभव प्रकाशन रायपुर छत्तीसगढ़ से प्रकाशित हुई है. आवरण सज्जा रेखांकन कथाकार ऋषि गजपाल ने किया है.
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• विमोचन समारोह में आप सादर आमंत्रित हैं.
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chhattisgarhaaspaas
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