बसन्त राघव की छत्तीसगढ़ी कविता, जै सिरी राम

▪️ बसंत राघव
सफ्फा जर भुंजा के रावन
ऐसन मोला लागत हे
मेघनाद अउ कुंभकरन हर
संगे संग धुधुवावत हे
फटक्का कस हाड़ा फूटय
चर्बी कस चुचुवावत हे
भुइयां ले आगास तक
आगी ह लपलपावत हे
चारो कोती खुशियाली छा गे
बगरिस चारों मुड़ा अंजोर
धरती- सरग म सिरी राम के
भरगे जैकारा के सोर
जैसन हरियाथे रुख राई
पा के ठंडा जल के धार
ओसने खिल गे सीता माई
सुन स्वामी के जै जै कार
राम राज धरती म आही
धरम करम ह पोठाही
लंद लबारी ल सपना मा
कोनो नई गोठियाही
फटक्का कस हाड़ा ह फूटय
चर्बी टघल के चुचुवावत हे
ए भुइयां ला वो आकास तक
आगी ह लपलपावत हे
काल के चक्का ढूलत हावे
झरत हे दिन,महिना, बछर
कतको जुग सिरा गे फेर
मूल ले बाढ़ गईस कन्तर।
कहां नंदा गिन राम ,लखन
कहां उच्छिन हो गिन बजरंगी
रावन के भरमार होगिस
गांव सहर मा रे संगी
कहां ले आइन राच्छस मन
किकियावत हें सब्बो झन
किलकिलात हें ठाउर ठाउर
मेघनाद अउ कुंभकरन
हजा गे मान- परतिस्ठा
धरती मन के नइ ए उबार
देवता धामी पथरा होगिन
नारी परानी करयं गोहर
राम बहुर के कब आहीं
जोहत रद्दा जुगन सिरा गे
ऐत्ताजार ल सहि सहि के
धरती मां के छाती पिरागे
ऐसनेच विजय परब मनाबो
तुच्छ रावन ला जलाबो
माँ बहिनी के चीर हरन होत
देखबो अउ चिटिक लजाबो।
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▪️ पता -पंचवटी नगर, कृषि फार्म हाउस, बोईरदादर, रायगढ़, छत्तीसगढ़
▪️ संपर्क- 83199 39396
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chhattisgarhaaspaas
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