कवि और कविता : डॉ. प्रेम कुमार पाण्डेय
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अवसान
जंगलों के ठूंठ होने
शिखरों के जमींदोज होने
बादलों के रूठने
नदियों के ठिठकने
आकाश परिंदे विहीन होने
हवाओं के गुमनामी में खोने
जिन्हें भी मैं प्यार करता हूं
जिनमें अपना अस्तित्व खोजता हूं
उनके पराभव से पहले
मैं विलीन होना चाहता हूं
और मालूम है
तुमसे कुछ पल पहले
जहां से रूखसत होना चाहता हूं।
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बहस
जीवन और मृत्यु की चिंता
हस्तक्षेप है
भगवत कार्य में।
भूख और रोटी की चिंता
व्यवधान है
व्यक्तिगत पुरुषार्थ में।
आओ मिल चिंता करें
भागीदारी ही यथार्थ है
सत्ता और सरकार में।
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वार्ता
तंत्र ,मंत्र,षड़यंत्र
कोई भी हो
हर समस्या का
समाधान
निकलता है
मात्र वार्ता से|
अक्सर
बौने सीना तान
नजरें ऊंची कर
बिच्छू के डंक-सी
घुमावदार मूंछों के साथ
वार्ता करते पाए जाते हैं|
आदमकद की
यही नियति है कि-
जब भी किसी बौने से
करता है वार्ता
निकालना चाहता है समाधान
अनायास
झुक जाती हैं नज़रें
लटक जाता है
उन्नत भाल|
अनन्त काल से
जब भी नत हुआ
सतफुटा ही
झरबेरी तो बस
अपने कांटकूस के साथ
अकड़ी- अकड़ी
चुभती ही है पैरों में
उसे छुपाना होता है
अपना बौनापन
अहंकार की रत्नजड़ी
मंजूषा में|
[ प्रगतिशील कवि डॉ. प्रेम कुमार पाण्डेय केंद्रीय विद्यालय वेंकटगिरी, आंध्रप्रदेश में पदस्थ हैं. ‘ छत्तीसगढ़ आसपास’ के आप नियमित रचनाकार हैं.
•संपर्क- 98265 61819 ]
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