बाल गीत : दुर्गा प्रसाद पारकर [ भिलाई-छत्तीसगढ़ ]
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फरा
कनकी पिसान म नून डार के
कस के सान ले पानी डार के
दुनो हाथ म तैं ओला बर ले
बर बर के एक जघा कर ले
कराही म फल्ली तेल डार के
जीरा ,तिली के फोरन डार दे
फरा ल तँय कराही म डार दे
साग कस तँय फरा बघार दे
लहुटा दे तँय जरे झन कहिके
लागत हे फरा अब चुरगे तइसे
धनिया बंगाला के चटनी बना ले
चटनी संग फरा ल तँय ह खा ले
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अड़गसनी
अड़गसनी खातिर बांस तैं छाट ले
जरूरत के लइक बांस ल काट ले
दुनो मुड़ा म कस के डोरी बांध दे
एकर बाद ओला मियार म टांग दे
अब होगे संगी अड़गसनी तइयार
अड़गसनी सहिथे कपड़ा के भार
हर घर म अड़गसनी जरूर रहिथे
सब झिन के कपड़ा टंगाए रहिथे
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लोचनी
कारीगीर ह लोहा ल भट्ठी म धंसाथे
लाल लाल लोहा ल संगसी म फंसाथे
संगसी म धरके संगी हथौड़ी म पीटथे
हथौड़ी म पीट के लोहा ल लमियाथे
दुनो डाहर के छोर ल चोक्खी बनाथे
बीच ले मोड़े के बाद लोचनी कहाथे
कांटा ल हेरे बर लोचनी ह काम आथे
कांटा निकले के बाद तन ह सुख पाथे
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सुवा
मसुर दार कस दिखथे तोर आँखी
हरियर हरियर दिखथे तोर पाँखी
टपट कुरू रे टपट कुरू कहिथस
मीठ बोलत तै पींजरा म रहिथस
पानी दे दे सगा आ हे वो कहिथस
सगा ल गोड़ धोए बर तैं कहिथस
मया पीरा बर सुवा हमर संगवारी
सुख दुख ल गोठियाथे घर के नारी
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chhattisgarhaaspaas
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