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विशेष : भारत रत्न कर्पूरी ठाकुर – आलेख, गणेश कछवाहा

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अधिकार चाहो तो लड़ना सीखो, पग पग पर
अड़ना सीखो, जीना है तो मरना सीखो.
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सौ में नब्बे शोषित हैं
शोषितों ने ललकारा है.
धन, धरती और राजपाठ
में नब्बे भाग हमारा है.

सामाजिक रूप से पिछड़ी किन्तु सेवा भाव के महान लक्ष्य को चरितार्थ करती नाई जाति में जन्म लेने वाले इस महानायक कर्पूरी ठाकुर ने राजनीति को भी जन सेवा की भावना के साथ जिया।समय काल में जहां जाति व्यवस्था, छुआ छूत , ऊंच नीच और भेदभाव की जटिल समस्या थी वहां उस समय कर्पूरी ठाकुर ने सामाजिक चेतना के साथ विचारात्मक रूप से भी पिछड़ी जाति के सम्मान और उत्थान के लिए सामाजिक व राजनैतिक संघर्ष किया समाज और राजनीति को एक नई दिशा दी।समाजवादी विचारधारा के प्रबल समर्थक थे। बहुत कम लोग होते हैं जो सही सोच,विचार और समझ कर अपनी एक लोक कल्याण दृष्टि के आधार पर समाज,राजनीति और राष्ट्र की दिशा और दशा तय करते हैं। लक्ष्य प्राप्ति के लिए कठिन से कठिन पथ और संघर्ष से कभी पीछे नहीं हटते। यही संघर्ष और सही विजन उन्हें युग पुरुष,महानायक व जननायक के विभूषण से विभूषित करता है।
कर्पूरी ठाकुर का जन्म 24 जनवरी 1924 भारत में ब्रिटिश शासन काल में समस्तीपुर जिले के पितौंझिया गाँव, जिसे अब ‘कर्पूरीग्राम’ कहा जाता है, में नाई जाति में हुआ था। उनके पिताजी का नाम श्री गोकुल ठाकुर तथा माता जी का नाम श्रीमती रामदुलारी देवी था। इनके पिता गांव के सीमान्त किसान थे तथा अपने पारंपरिक पेशा बाल काटने का काम करते थे।
उन्होंने 1940 में मैट्रिक की परीक्षा पटना विश्वविद्यालय से द्वितीय श्रेणी में पास की। 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन छिड़ गया तो उसमें कूद पड़े। परिणामस्वरूप 26 महीने तक भागलपुर के कैंप जेल में जेल-यातना भुगतने के उपरांत 1945 में रिहा हुए। 1948 में आचार्य नरेन्द्रदेव एवं जयप्रकाश नारायण के समाजवादी दल में प्रादेशिक मंत्री बने। सन् 1967 के आम चुनाव में कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व में संयुक्त समाजवादी दल (संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी) (संसोपा ) बड़ी ताकत के रूप में उभरी। 1970 में उन्हें बिहार का मुख्यमंत्री बनाया गया। 1973-77 में वे लोकनायक जयप्रकाश के छात्र-आंदोलन से जुड़ गए। 1977 में समस्तीपुर संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से सांसद बने। 24 जून, 1977 को पुनः मुख्यमंत्री बने। फिर 1980 में मध्यावधि चुनाव हुआ तो कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व में लोक दल बिहार विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरा और कर्पूरी ठाकुर एक अद्वितीय लोकप्रिय राज नेता बन गए।
कर्पूरी ठाकुर सदैव दलित, शोषित और वंचित वर्ग के उत्थान के लिए प्रयत्नशील रहे और संघर्ष करते रहे। उनका सादा जीवन, सरल स्वभाव, स्पष्ट विचार और अदम्य इच्छाशक्ति बरबस ही लोगों को प्रभावित कर लेती थी और लोग उनके विराट व्यक्तित्व के प्रति आकर्षित हो जाते थे। बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में उसे प्रगति-पथ पर लाने और विकास को गति देने में उनके अपूर्व योगदान को सदैव स्मरण किया जाएगा।
कर्पूरी ठाकुर दूरदर्शी होने के साथ-साथ एक ओजस्वी वक्ता भी थे। आजादी के समय पटना की कृष्णा टॉकीज हॉल में छात्रों की सभा को संबोधित करते हुए एक क्रांतिकारी भाषण दिया कि “हमारे देश की आबादी इतनी अधिक है कि केवल थूक फेंक देने से अंग्रेजी राज बह जाएगा” । इस भाषण के कारण उन्हें दण्ड भी झेलनी पड़ी थी।वह देशवासियों को सदैव अपने अधिकारों को जानने के लिए जगाते रहे, कहते थे-
“संसद के विशेषाधिकार कायम रहें, अक्षुण रहें, आवश्यकतानुसार बढ़ते रहें। परंतु जनता के अधिकार भी। यदि जनता के अधिकार कुचले जायेंगे तो जनता आज-न-कल संसद के विशेषाधिकारओं को चुनौती देगी”
कर्पूरी ठाकुर का चिर परिचित नारा था जो सामाजिक राजनैतिक गलियारे में गूंजा करता था..
*सौ में नब्बे शोषित हैं,शोषितों ने ललकारा है।
धन, धरती और राजपाट में नब्बे भाग हमारा है॥*
*अधिकार चाहो तो लड़ना सीखो
पग पग पर अड़ना सीखो
जीना है तो मरना सीखो।*
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उनकी सेवा भावना के कारण ही उन्हें जननायक कहा जाता था, वह सदा गरीबों के अधिकार के लिए लड़ते रहे। मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने पिछड़ों को 12 प्रतिशत आरक्षण दिया मुंगेरी लाल आयोग के तहत् दिए और 1978 में ये आरक्षण दिया था जिसमें 79 जातियां थी।इसमें पिछड़ा वर्ग के 12% और अति पिछड़ा वर्ग के 08% दिया था।उनका जीवन लोगों के लिया आदर्श बन गया था।
*कर्पूरी ठाकुर जी की स्मृति , उनके विचारों,चिंतन, दृष्टि और संघर्ष को स्मरण किया जाना भारतीय राजनीति और सामाजिक व्यवस्था के लिए अनिवार्य है।उन्होंने जो संघर्ष किया,आदर्श प्रस्तुत किया,सामाजिक और राजनीतिक उन्नति की जी दिशा दी आज उसे पूरी ऊर्जा और चेतना के साथ आगे बढ़ने और जीवंत करने की जरूरत है। यही कारण है कि उनके जन्म शताब्दी वर्ष तथा निधन के 36 वर्षो बाद भी राजनीति,सियासत या यों कहें कि घोर दक्षिण पंथी, हिन्दुत्ववादी कार्पोरेट्स परस्त,पूंजीवादी सत्ता को भी जननायक कर्पूरी ठाकुर जी की शरण में जाना पड़ा , उन्हें उनकी याद आई। समाज और राजनीति में उनकी विलक्षण प्रतिभा ,जुझारूपन, और सेवा भाव ने उन्हें समाज और राजनीति का महानायक बना दिया था।उन्हें भारत रत्न के सर्वोच्च अलंकरण से अलंकृत किया गया।अब राजनीति के महानायक, जननायक ,भारत रत्न के संबोधन से संबोधित किया जाने लगा है। सन 1991 में भारत सरकार ने उनके सम्मान में डाक टिकट भी जारी किया था।
कर्पूरी ठाकुर का निधन 64 साल की उम्र में 17 फरवरी, 1988 को दिल का दौरा पड़ने से हुआ था। जन्म शताब्दी वर्ष और आज पुण्य तिथि पर ऐसे महानायक,भारत रत्न कर्पूरी ठाकुर जी को शत शत नमन।

▪️ गणेश कछवाहा
▪️ संपर्क : 94255 72284
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