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कहानी आसपास : तारक नाथ चौधुरी
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उपहार नहीं प्यार था वो…
– तारक नाथ चौधुरी
[ चरोदा, भिलाई, छत्तीसगढ़ ]
अपनी कमाई से खरीदी गई मोटर सायकिल की चोरी की घटना से मर्माहत था भतीजा।भैया के परलोक गमन के बाद से जैसे सुख का क्रमशः निर्गमन होने लगा था।आये दिन कोई न कोई विपत्ति आती और जमा पूँजी लूटकर ले जाती।विपन्नता की इसी अँधियारी में मोटर बाइक का चोरी हो जाना-भतीजे को लाचार कर दिया था।दर्द और परेशानी की घडी़ में भी ठहाके लगाने ओर सुमधुर गीत गा लेने की अद्भुत क्षमता उसमें निश्चित रुप से दादाजी के रुधिर कणों से संचरित हुई थी जो कभी अपनी परेशानियों को विज्ञापित नहीं करते थे तभी तो घटना से हम एक सप्ताह बाद अवगत हुए,जब उससे फोन पर बातचीत हुई। मैंने सुनते ही परिवार के सभी सदस्यों तक ख़बर पहुँचा दी।मैं अपनी स्कूटी उसे देना चाहता था पर वो स्वाभिमानी मुस्कुराते हुए अस्वीकार कर दिया।लगभग 15 दिन बीत चुके थे लेकिन चोरी गई मोटरसायकिल के संबंध में थाने से कोई शुभ सूचना भतीजे को नहीं मिली थी और वो अपने कार्यस्थल
पर सायकिल से जाने लगा था।ये बात जब छोटे भाई के कानों तक पहुँची(जो एक अदालती मामले का निपटारा कर हैदराबाद से लौटा था) तो वो विचलित हो गया।अगले दिन उसने भतीजे को रात के लगभग 8 बजे फोन किया और तुरंत चरोदा आने के लिए कहा।भतीजा घबरा गया।उसे लगा-हम बूढों में से कोई न कोई बीमार हो गये हैं।वो ढेर सारी आशंकाओं और अशुभ कल्पनाओं का बोझ मन-मस्तिष्क में लिए जब बस में सवार हुआ तो उसे 22किलोमीटर की दूरी22योजन की दूरी सी लगने लगी।बस की मंथर गति उसकी बेचैनी को दुगुनी कर रही थी तभी तो रह-रहकर वो ड्राइवर-कंडक्टर से जल्दी चलने का अनुरोध कर रहा था।
बस लगभग 9 बजे चरोदा पहुँची।भतीजा भीड़ को धकियाते हुए बस से उतरा और तेज़ क़दमों से “लीला भवन”.की ओर बढ़ चला।
इथर घर पर हम सभी झूठी उदासी को ओढे़,गंभीर मुद्रा में ड्राइंग रुम में बैठे हुए थे और भतीजे के आने का इंतजा़र कर रहे थे।
भतीजा लगभग हाँफता हुआ काकिमा-सेजो काका की गुहार लगाते ड्राइंग रुम की तरफ आया।हमारे चेहरों के कृत्रिम भावों को वो सरलमना भतीजा सच समझ बैठा और बारी-बारी से सभी को झिंझोड़ते हुए इस अचानक बुलावे का कारण पूछने लगा।
हमसे उसकी रोनी सूरत देखी नहीं गई और हम सब एक साथ बोल पडे़-सरप्राइज़!सरप्राइज़!सरप्राइज़!छोटे भाई ने उसे गले लगाते हुए उसके हाथों में लाल रिबन से बँधी एक चाभी थमा दी और कहा- इतनी रात को तू दुर्ग वापस कैसे जायेगा,इसलिए तुझे ये बाइक की चाभी दे रहा हूँ।वो देख,बाइक खडी़ है।
होंडा कंपनी की चमचमाती नई बाइक देखकर भतीजे की आँखें चमक उठीं जो अगले ही पल खुशी के आँसू के निर्झर में बदल गईं।वो दौड़कर काका से लिपट गया,उसके चरण छुए और कहा-“मेरे जीवन का सबसे अनमोल उपहार आज तुमने मुझे दिया काका।आओ हम बाइक के साथ एक सेल्फी लेते हैं।”
देर रात घर पहुँचकर जब भतीजे ने माँ से(हमारी भाभी)अपने नायाब उपहार के बारे में सारी बातें बताईं तो माँ ने उससे कहा-बेटा उपहार का नाम देकर पितृतुल्य काका के स्नेह का अवमूल्यन मत करो।उपहार तो एक औपचारिक प्रतीक होता है जो केवल आनंद के मुहूर्त में दिया-लिया जाता है।दुःख की घडी़ में अपनों से जो मिलता है वो उपहार नहीं सच्चा प्यार होता है।काका ने जो दिया- उपहार नहीं प्यार था वो!
•संपर्क-
• 83494 08210
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chhattisgarhaaspaas
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