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भिलाई की बहू- आलेख, विजय वर्तमान

अपनी विशिष्ट जनक्रांति के द्वारा अंग्रेजों की नापाक ग़ुलामी से निज़ात पाने के बाद समूचा देश पंडित नेहरू के “विज़न “और महत्वाकांक्षाओं के अनुरूप राष्ट्र के निर्माण हेतु संकल्प के साथ उठ खड़ा हुआ । शिक्षाक्रान्ति और औद्योगिक क्रांति के मंसूबों ने त्वरित गति से देश की तस्वीर बदलनी शुरू की । अनेकानेक विशाल – विराट परियोजनाओं में सर्वाधिक उल्लेखनीय सार्वजनिक उपक्रम भिलाई इस्पात संयंत्र का निर्माण सोवियत संघ के तकनीकी सहयोग से तत्कालीन मध्यप्रदेश और वर्तमान छत्तीसगढ़ के भिलाई में हुआ। इस संयंत्र ने अपनी ख़ुशगवार कार्यसंस्कृति की बदौलत अविश्वसनीय तकनीकी उपलब्धियां हासिल करने में निरंतरता को खण्डित नहीं होने दिया और अनेक विस्मयकारी कीर्तिमान गढ़े एवं तोड़े । यह संयंत्र आज तलक सिरमौर पब्लिक सेक्टर बना हुआ है ।


उल्लेखनीय यह है कि सिर्फ़ संयंत्र ही नहीं अपितु इस्पातनगरी भिलाई ने भी अपनी विशिष्ट संस्कृति विकसित करने में सफ़लता पायी । वस्तुतः भिलाई-इस्पात-संयंत्र में प्रारंभ से ही देश के सभी क्षेत्रों और प्रान्तों से सभी स्तर के अधिकारियों , कर्मचारियों और श्रमवीरों की आमद हुई । स्पष्ट है कि एक सीमित क्षेत्र में समूचे देश के लोग अपनी-अपनी भाषा , संस्कृति , खानपान-पकवान-व्यंजन , रहन-सहन , रीति-रिवाज , पूजन-पद्यति , परम्परा , समझ और चिंतन के साथ रहने लगे । सांस्कृतिक भिन्नता-जन्य प्रारंभिक तकरारों , टकरावों , असहमतियों,अस्वीकृतियों के बाद धीरे-धीरे आपसी समझ विकसित होने लगी और सबने मिलकर हौले से एक साझी संस्कृति की नींव रख दी । इस नींव पर भव्य सांस्कृतिक भवन का निर्माण उस आबादी ने किया जो यहाँ बहू बनकर आयी और शुरुआती उहापोह के बाद शीघ्र ही इस मिश्रित संस्कृति में रच-बस गयी ।
यह संस्कृति भिलाई की अपनी संस्कृति है जिसे अभिमान के साथ ” भिलाई की लोकसंस्कृति ” की संज्ञा दी जा सकती है । भिन्नताएं निरन्तर एक साथ एक हांड़ी में पकती गयीं , फिर एकसार होकर एक सर्वप्रिय स्वाद वाले लोकसांस्कृतिक व्यंजन के रूप में प्रकट हुईं । लोकसंस्कृति का निर्माण समाज के वैचारिक और मनोवैज्ञानिक रूपांतरण के बिना सम्भव नहीं होता । भिलाई की बहुओं ने मिलकर इस रूपांतरण को सम्भव बनाया । समान भाषा , समान भोजन , समान परिधान , समान श्रृंगार , समान रुचि , समान समझ और समान विचार के साथ-साथ इस नगरी ने स्वयं का समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र विकसित कर लिया ।

▪️ डॉ. सोनाली चक्रवर्ती
भिलाई की संस्था “शपथ फाउंडेशन” ने अपने शहर भिलाई को धन्यवाद कहने “थैंक यू भिलाई” कार्यक्रम का आयोजन किया जिसमें वे प्रत्येक वर्ष क्षेत्र से नवरत्नों का चुनाव कर उन्हें अलंकृत करते हैं।
इस कार्यक्रम में नाटिका “भिलाई की बहू ” के माध्यम से प्रकाश एवं ध्वनि का प्रयोग करते हुए इस असाधारण सामाजिक – सांस्कृतिक परिघटना को बेहद चुटीले अंदाज़ में प्रस्तुत किया गया है । इस दीर्घकालीन सामाजिक घटना की रंगमंचीय परिकल्पना ही रोमांचित करने वाली है । डॉ.सोनाली चक्रवर्ती की अगुवाई में संगठित एवं निरन्तर सक्रिय संस्था “स्वयमसिद्धा” (जो विवाहित महिलाओं की सम्भवतः एकमात्र अखिल-भारतीय स्वयमसेवी संस्था है) ने भिलाई की बहुओं को मंच पर उतारा है।
डॉ.सोनाली अपने भाग्य पर इतराती हैं कि वे भिलाई की बेटी भी हैं और बहू भी । भिलाई की पौध होने के नाते वे यहाँ की रगों – रेशों में प्रवाहित मनोविज्ञान से भली-भांति वाकिफ़ हैं । उन्होंने इस टाऊनशिप को निर्मित और विकसित होते देखा है । यहाँ की सामूहिक चेतना के निर्माण में उनका भी योगदान है । उन्होंने भिलाई के उदात्त चरित्र को आत्मसात किया है । उनकी नज़र में भिलाई संसार की सर्वाधिक सुंदर और सुरक्षित जगह है । भिलाई के लिए उनका भावुक सरोकार मंच पर मज़ेदार ढंग से मुखरित हुआ है ।
” भिलाई की बहू ” के माध्यम से मनुष्य के भीतर मौजूद सदाशयता और मिलजुलकर रहने के अप्रतिम आनंद तथा नैसर्गिक उल्लास का उद्घाटन हुआ है । विपरीत परिस्थितियों में मनुष्य की रचनात्मक अनुकूलन-क्षमता के सुखद संकेत नाटिका में व्याप्त हैं ।
भिलाई की बहुओं का मंच पर धमाल स्वागतेय है ।

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जियो स्वयंसिद्धा
•उल्लेखनीय है कि डॉ. सोनाली चक्रवर्ती छत्तीसगढ़ की प्रथम महिला ‘लाइट एंड साउंड शो राइटर डायरेक्टर’ है.
•डॉ. सोनाली चक्रवर्ती महिलाओं के निखारने में गत 20 वर्षों से उनकी प्रतिभा को मंच व सम्मान देने के कार्य में जुटी हुई है.
•डॉ. सोनाली चक्रवर्ती, प्रिंट राष्ट्रीय मासिक पत्रिका एवं वेब साइट वेब पोर्टल न्यूज़ चैनल और यू ट्यूब चैनल ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ की संपादकीय मंडल की सदस्य व निर्देशिका हैं.
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▪️ विजय वर्तमान
▪️ संपर्क- 94062 07975
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chhattisgarhaaspaas
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