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कहानी : दीप्ति श्रीवास्तव
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अनावृत कदम
– दीप्ति श्रीवास्तव
[ भिलाई : छत्तीसगढ़ ]

‘बड़ी चली आई सिखाने’
‘अरे तुम तो पहले से ही सीखी सिखाई हो’
‘अच्छा जी , तो यह बात है’
‘चल हट मैं तुझसे बात नहीं करती ‘
दोनों सखियां कालेज जाने और आने में लम्बे रास्ते की पनाह लेती ताकि ज्यादा से ज्यादा बातचीत का लुफ्त ले सके । बचे समय को इन्ही बातों का सहारा लेकर घर में मन लगाकर काम कर पढ़ाई कर सके ।
सुमिता के पास तो बहुत समय रहता पर सुनंदा घर में कदम रखते ही धीर गंभीर बन कामों में जुट जाती छोटे भाई-बहनों ने अपनी दीदी को यदा-कदा ही हंसते हुए देखा । मां की बीमारी ने उसे बड़ी होने का दायित्व निभाना भली-भांति सीखा दिया । कभी-कभार वह सुमीता का जीवन देख अपनी खीज छोटे भाई बहनों पर निकालती ।
गुनगुनाते हुए काम निबटा रही थी कि मां ने आवाज लगाई -‘पानी लाना बिटिया दवा खाना है’ आज रसायन के प्रैक्टिकल में आनंद का साथ मिलने पर वह मन ही मन पुलकित हो रही थी । इस समय मां का पुकारना उसे अच्छा न लगा काम करते मीठी यादों को लगाम लगा वहीं से चिल्ला कर भाई को आवाज लगाई
‘संदेश मां को पानी दो ।’
चार बहन एक भाई की टोली में वह भाई से भी वह दौड़ा दौड़ा कर काम करवाती । मां बिस्तर पर लेटी कुढ़ती रहती ‘लड़के से काम करवाती है ।’
‘आजकल लड़का-लड़की सब बराबर हैं ‘
मां को लड़के की चाहत ने ही इस कदर कमजोर कर दिया नहीं तो आज के जमाने में कौन इतने बच्चे करता है। वह मन ही मन भिनभिनाती अगर मुंह खोलती तो बाबूजी तक शिकायत किस रुप में पहुंचती है नतीजा देख चुकी थी । इसी डर से सब बहनों ने काम बांट लिया था ।
कोई झाड़ू पोंछा निबटाती तो कोई कपड़े धोती सुबह-शाम का खाना पकाने में उसका हाथ बंटाने में कोई भी बहन आ जाती । भाई को पानी भरने बाहर के काम के लिए लगा रखा था । पिता की प्राइवेट नौकरी में घर चल जाता यही बड़ी बात मां को तसल्ली देती पर इन कलमुंहियों का ब्याह कैसे होगा सोच सोच कर अपना ब्लडप्रेशर बढ़ा लेती। अपनी गोरी चिट्टी मेघावी कन्याओं को कलमुंही उपाधि मां ने दी थी । सबसे बड़ी बात तो यह थी की लड़कियों को पढ़ाई में पैसा नहीं लगता था ऊपर से सरकारी स्कूल कालेज से वजीफा भी लाती थी । लड़का जरूर प्राइवेट इंग्लिश स्कूल में पढ़ता था । जिसकी पढ़ाई पर बहनों ने कड़ी नजर रखी थी ।
लड़के के साथ सीखते सीखते लड़कियां भी अंग्रेजी बोलने में उस्ताद हो गई थी । यह बात ही उन्हें अन्य विधार्थियों से भिन्न करती थी ।
केमिस्ट्री प्रैक्टिकल में आनंद का साथ सुनंदा को कल्पना में विचरण करने पहुंचा देता । बड़े घर का इकलौता वारिस उनका कालेज शहर के नामी कालेजों में से था जिसमें उसे योग्यता के बल पर एडमिशन मिला था ।
कुछ दिनों से आनंद कालेज नहीं आ रहा था । संकोची स्वभाव की सुनंदा किसी से उसके बारे में पूछने में असमर्थ थी । इत्तफाक से सुमिता ने ही आनंद के अनुपस्थिति का पूरा ब्यौरा सुना दिया। उसके पिता सरकारी महकमे में बड़े पद पर रहते हुए ईमानदार अफसरों में गिने जाते थे । सरल विनम्र स्वभाव के उसके पिता पर किसी ठेकेदार ने उनकी मातहत महिला कर्मचारी को उनके विरुद्ध अनाचार का आरोप के लिए प्रेरित किया क्योंकि उसके पिता की वजह से ठेकेदार को आगे काम मिलने में दिक्कत हो रही थी। आफिस का माहौल इस कदर दूषित कर दिया की उसके पिता का जीना हराम हो गया । उसके बाद आस-पड़ोस में भी अनर्गल बातों की हवा चला दिया लोगों को रसपान करने का मौका हासिल हो गया । चटपटी बातें किसे नहीं भाती उनका रसपान करना सभी परम कर्तव्य समझते हैं । इन्हीं बातों से आंनद के पिता बहुत परेशान रहने लगे । जब इस आतंकित, मानसिक शोषण करने वाली घटना पर उनका साथ देने कोई तैयार ना हुआ वह डिप्रेशन में रहने लगे । एक दिन इसी के चलते कोई ग्रुप आफिस में उनको सुना सुना कर जलील कर रहा था । उनसे झगड़ा करने पर वे लोग मारपीट पर उतारू हो गए । चारों ओर से उनको परेशान करने वालों की जीत उस दिन हो गई जब आफिस में ही उन्होंने अपनी इहलीला समाप्त कर दी ।ऊपर से लेकर नीचे तक कोई उनका साथ देने न खड़ा हुआ और मरने के बाद सब सियापा मनाने उनके घर आ रहे हैं जिनके मुख देखना उनकी पत्नी को जरा भी ना भा रहा था तथापि आगे के काम आफिस में उन्हीं लोगों से करवाना था इसलिए मुंह सिल रखी थी। किसी ने भी अपनी नैतिक जिम्मेदारी नहीं समझी । खाने-खिलाने की प्रथा में एक थैले के चट्टे बट्टे जो ठहरे ।इस घटना का असर आनंद पर भी आया । सब लड़के लड़कियां मिलकर उसके घर जाने वाले हैं।
‘ तुम भी चलोगी सुनंदा? ‘
‘मां को तो तुम जानती हो ना , फिर कैसे ‘
‘बोल देना प्रैक्टिकल है देर से घर पहुंचूंगी ‘
‘आइडिया सुनंदा को जम गया’
पहली बार इतना सुन्दर सुव्यवस्थित ड्राइंगरुम सुनंदा ने किसी का देखा था । आनंद की मम्मी का सूखा चेहरा देखकर उसे दिल में उनके लिए दया उपज आई ।
परिक्षा सिर पर थी उसने भी आनंद को कोई नोट्स वगैरह की सहायता चाहिए होगा तो उससे लेने बोल निकल आई । घर लौट कर भी आनंद के बारे में ही सोचती रही ।
खैर उस जैसे होशियार लड़के को वह जानती थी कभी सहायता की आवश्यकता नहीं पड़ेगी । क्योंकि उसकी और आनंद की पढ़ाई में हमेशा होड़ लगी रहती और दोनों एक दूसरे से प्रभावित भी रहते पर कभी दोनों में से किसी ने अपनी ओर से पहल नहीं की सुनंदा अपनी हदें जानती थी और आनंद लड़कियों से बात करने कतराता क्योंकि दोस्तों को वह अफवाह उड़ानें का मौका नहीं देना चाहता था । शायद यह उसके भीतर की सुनंदा हिलोरें मार रही थी जो आंनद को देखने की चाहत रखती थी प्रेम की खोज में निकल पड़ी वह भी बिना मां को बताये पहली बार ऐसा कदम उठाया ।
आज आवृत कदम आनंद का हालचाल लेने अनावृत हो स्वयं चल पड़े ।
• संपर्क-
• 94062 41497
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chhattisgarhaaspaas
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