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समीक्षा : ‘माँ की बातें’ – कवयित्री पूनम पाठक ‘बदायूँ’ : समीक्षक – पी. यादव ‘ओज’

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यकीन है मुझे कि ऐ खुदा! तू मुझे फिर कभी ना कभी मिल ही जाएगा,
पर पूछता हूँ मैं तुझसे कि खोकर माँ का आंचल लौट क्या फिर आएगा…? – पी. यादव ‘ओज’

👉 पूनम पाठक ‘बदायूँ’
माँ की बातें यह केवल कोई एक काव्य-संग्रह ही नहीं,बल्कि साक्षात उस माँ का आशीर्वाद और भारत माता की करुण पुकार है।
अतीत अक्सर वर्तमान के माध्यम से ही एक सुंदर भविष्य का निर्माण करता है।यह काव्य संग्रह भी इस तथ्य को पूर्णता प्रमाणित करता है।
मन के समंदर से भावों के कुछ मोतियों को चुनकर,साथ ही कल्पना के गहन आकाश से स्वर्णिम शब्दों के झिलमिलाते सितारों को सजाकर जब विचारों की काव्यात्मक अभिव्यक्ति दी जाती है,तब वह काव्य ‘कविता’ कहलाती है।
कविता वास्तव में काव्य की आत्मा है।कविता की काव्यधारा जब रसानंद से जोड़ती है,तब वह परमानंद की अनुभूति करवा ही देती है।
“गद्य जहां साहित्य का मेरुदंड है,वहीं पद्य या कविता साहित्य का हृदय है।”
कविता के अभाव में किसी भी साहित्य की कल्पना एक निरा कोरा स्वप्न है।
‘माँ की बातें’ एकल काव्य-संग्रह वास्तव में कविता की परिपाटी और लीक का एक नवीनतम उद्देश्यपरक सृजन है,जो उसे सदसाहित्य की श्रेणी में खड़ा करने में सक्षम है।
इस एकल काव्य संग्रह की कवयित्री पूनम पाठक जी हैं। जिनकी लेखनी गद्य और पद्य दोनों में बरबस बोलती है।यह पुस्तक ‘इंकलाब प्रकाशन’ मुंबई के द्वारा प्रकाशित है,जो प्रकाशन के क्षेत्र में अग्रणी एवं सफल है।
लेखिका ने अपने इस काव्य-संग्रह को जन्मदात्री,जननी पूजनीय,वंदनीय माताश्री एवं जगत-पिता भगवान श्रीविष्णु को समर्पित किया है।
जहाँ साहित्य मनीषी श्री महेंद्र मानिक जी ने ‘माँ की बातें’ काव्य को ‘संवेदनाओं का सागर’ कहा है,वहीं साहित्य से समृद्ध रितु शर्मा जी ने इस जीवन का निचोड़ माना है।
दूसरी ओर लेखन की धनी लेखिका प्रवेश शर्मा ‘पाठक’ जी का मानना है कि काव्य-संग्रह ‘माँ की बातें’ वास्तव में पूनम पाठक जी का वह अनुपम सृजन है,जहाँ लेखक केवल लिखता ही नहीं,बल्कि उसमें ही स्वयं का संपूर्ण जीवन जीता है।
अनुक्रमणिका के आधार पर यह पुस्तक 114 जीवन-उपयोगी रचनाओं से सुसज्जित है।जहां पुस्तक की पहली रचना ईश्वरीय वंदना है,वहीं काव्य-संग्रह के अंतिम पृष्ठों ‘बस यूं ही’ (भाग 1 से 8 ) में जीवन के संपूर्ण भावों का सहज ही दर्शन होता है।
पृष्ठ क्रमांक-13
रचना क्रमांक- 1 वंदना
यहाँ कवयित्री ने भारत माता की वंदना करते हुए स्वयं की इच्छा एवं अभिलाषा को व्यक्त किया है।इन पंक्तियों के माध्यम से रचयिता के निस्वार्थ देशप्रेम की भावना सर्वत्र झलकती है। जैसे-
चरणों में बैठ मां वंदना करूं,
तेरी कृपा होय उर बंधन कटे।
भारत में मैं मां जीवन जीऊं,
लेखनी यह मां देशप्रेम लिखें।।
‘मां की बातें’ काव्य-संग्रह को सार्थक करती पृष्ठ संख्या 14 की एक रचना ‘क्यों याद आए’ देखें-
गम तो सही,पर रोती ना दिखी,
उसकी यह अदा क्यों याद आए।
लोरी गाकर सुलाया,जागती रही,
वो मातृत्व क्यों याद आए…..!
इस काव्य संग्रह के माध्यम से रचयिता ने जीवन के संपूर्ण भावों एवं सार्थक उद्देश्यों को प्रस्तुत करने की एक सफल चेष्टा की है।कवयित्री ने वर्तमान की स्थितियों को भांपते हुए आज के लेखक एवं कलमकारों से आह्वान करते हुए जो लिखा है, उसकी एक बानगी देखिए-
रचना क्रमांक-9
पृष्ठ क्रमांक- 20 में उद्धृत यह पंक्तियां कवयित्री के मनोभाव को सफल रूप से अभिव्यक्त करते हैं।
कलम तू ना नयनों का नीर लिख,
हो सके तो हृदय का धीर लिख।
कल्पना के पंख गीले हैं अभी,
प्रेम लिख,न नफरत की आग लिख।।
देश प्रेम की भावना से बढ़कर कोई भावना नहीं होती।आइए,देश प्रेम की भावना का आनंद लेते हैं।
रचना संख्या-13
पृष्ठ क्रमांक-24
मेरे देश की मिट्टी चंदन है,गहनों की जड़ कुंदन है।
धरती हम सबकी मां है,यह पूजनीय मां अंबा है।।
एक नारी मन के ममत्व एवं संवेदना से पूर्ण भावों को अभिव्यक्त करती यह पंक्तियां जरूर पढ़िए।’मां तू कहां खो गई’ कविता में जहां कवयित्री ने मां की ममता एवं संवेदना को आत्मसात किया है,वहीं ‘विदाई’ कविता के माध्यम से मां से बेटियों के बिछड़ने का एक मार्मिक दृश्य सामने आता है।
ऐसे ही कई जीवन उपयोगी,जीवन-दर्शन एवं स्वयं के संघर्ष को इस काव्या-संग्रह में उकेरने की कोशिश की गई है।
इस तरह पुस्तक की लेखिका ने शीर्षक ‘मां की बातें’ को अपनी लेखनी से सार्थक एवं सफल किया है।
‘बस यूं ही’ (भाग 1 से 8 )के अंतर्गत कवयित्री ने अतीत,वर्तमान और भविष्य के सभी दृश्यों को अत्यंत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है।
इस काव्य संग्रह की रचनाओं में कवयित्री स्वयं जीवन जीते हुए एहसासों को शब्दों एवं भावों के माध्यम से महसूस करवाती हैं।
‘मां की बातें’ काव्य-संग्रह की रचनाओं की भाषा सरल,शिष्ट और बोधगम्य है।लेखिका की लेखनी देश प्रेम,समतावाद, प्रकृति-प्रेम और मानवतावादी से ओतप्रोत है।
इस पुस्तक का रंग-अलंकरण,साज-सज्जा एवं बनावट मनमोहक एवं शीर्षक को सार्थकता प्रदान करता है।
गुणवत्ता के आधार पर भी यह पुस्तक खरी उतरती है।
रचयिता पूनम पाठक जी की यह पुस्तक मां की बातें आने वाले समय में समाज को एक नई दिशा दिखाने एवं पाठकों के मन को आनंदित करने में सफल होगी,ऐसा मेरा मानना है।
मैं पुनः इस पुस्तक की रचयिता पूनम पाठक जी को इस पुस्तक की सफलता हेतु अनंत-अनंत बधाइयां एवं अग्रिम शुभकामनाएं ज्ञापित करता हूं।
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‘माँ की बातें’
कवयित्री- पूनम पाठक ‘बदायूं’
प्रकाशन- इंकलाब प्रकाशन, मुंबई
वर्ष – 2024
मूल्य – 299 रु.
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• संपर्क-
• 97192 33149
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chhattisgarhaaspaas
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