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‘मुक्तकंठ साहित्य समिति’ एवं ‘ बंगीय साहित्य संस्था’ के संयुक्त तत्वावधान में साहित्यिक आयोजन : ‘मुक्तकंठ’ और ‘ गुफ़्तगू’ पत्रिका का लोकार्पण व चर्चा गोष्ठी में मुख्यअतिथि प्रसिद्ध व्यंग्यकार विनोद साव ने कहा कि ‘बांग्ला साहित्य और विचार जगत ने देश की मुख्यधारा के साहित्य और विचार जगत का नेतृत्व किया और गोविंद पाल की कविता ‘आम आदमी’ को वर्तमान संदर्भों में उद्धृत किया…’

👉 { बाएँ से } प्रदीप भट्टाचार्य, रजनीकांत श्रीवास्तव, गोविंद पाल, विनोद साव, अतनु बनर्जी, रौनक जमाल, नूरसब्बा खान, डॉ. भवानी प्रसाद मुखर्जी, प्रकाशचंद्र मण्डल और बृजेश्वर मलिक
छत्तीसगढ़ आसपास [भिलाई 14, जुलाई] : ‘मुक्तकंठ साहित्य समिति’ एवं ‘बंगीय साहित्य संस्था’ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘मुक्तकंठ’ मासिक बुलेटिन और हिंदुस्तानी साहित्य की त्रैमासिक पत्रिका ‘गुफ़्तगू’ के लोकार्पण, समीक्षा कार्यक्रम के मुख्य अतिथि ख्यातिलब्ध व्यंग्यकार विनोद साव थे. अध्यक्षता ‘मुक्तकंठ साहित्य समिति’ के अध्यक्ष गोविंद पाल थे.
इस अवसर पर अन्य विशिष्ट अतिथि थे-
‘हिंदू मिलन मंदिर’ के अध्यक्ष अतनु बनर्जी, ‘बंगीय साहित्य संस्था’ के पूर्व अध्यक्ष डॉ. भवानी प्रसाद मुखर्जी, अंतर्राष्ट्रीय शायर लेखक रौनक जमाल, पुलिस अधीक्षक सीआईडी व कवि नरेंद्र कुमार सिक्केवाल और शायरा नूरसब्बा खान.
‘गुफ़्तगू’ पत्रिका के समीक्षक वक्ता थे-
‘मुक्तकंठ साहित्य समिति’ के पूर्व अध्यक्ष व साहित्यकार रजनीकांत श्रीवास्तव, बांग्ला भाषा में प्रकाशित लिटिल पत्रिका ‘मध्यबलय’ के संपादक व बांग्ला-हिंदी के कवि दुलाल समाद्दार और ‘ मुक्तकंठ’ एवं ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ के संपादक प्रदीप भट्टाचार्य.
प्रारंभ में अतिथियों ने सरस्वती पूजन किया और ‘हिंदू मिलन मंदिर’ के पुरोहित पं. वासुदेव भट्टाचार्य द्वारा मंत्रोउच्चार के साथ आरती की गई. तत्पश्चात अतिथियों का पुष्पगुच्छ से स्वागत किया गया. विनोद साव का संस्था द्वारा शॉल श्रीफल से अभिनंदन किया गया. रौनक जमाल और नवेद रज़ा दुर्गवी ने गोविंद पाल का शॉल श्रीफल से सम्मानित किए.

👉 विनोद साव का सम्मान करते हुए ‘मुक्तकंठ’ और ‘बंगीय’ के पदाधिकारी

👉 विनोद साव का सम्मान करते हुए पं. वासुदेव भट्टाचार्य

👉 विनोद साव का श्रीफल से सम्मान करते हुए प्रदीप भट्टाचार्य

👉 ‘मुक्तकंठ’ बुलेटिन का लोकार्पण अतिथियों द्वारा

👉 ‘गुफ़्तगू’ का विमोचन करते हुए अतिथि
स्वागत वक्तव्य देते हुए प्रदीप भट्टाचार्य ने कहा-
आज इस वैचारिक गोष्ठी एवं लोकार्पण कार्यक्रम में उपस्थित सभी सुधिजनों का ‘मुक्तकंठ’ और ‘बंगीय’ परिवार की तरफ से हार्दिक स्वागत व अभिवादन है. विशेष रूप से नये सदस्य बने कवि ठाकुर दशरथ सिंह भुवाल का. उपस्थित सभी अतिथियों का भी स्वागत करते हुए प्रदीप भट्टाचार्य ने कहा कि मेरे संपादकीय में आप सभी सदस्यों के सहयोग से ‘मुक्तकंठ’ बुलेटिन नियमित प्रकाशित हो रही है. बुलेटिन का मुल्यांकन मैं आप सदस्यों पर छोड़ता हूँ. ‘गुफ़्तगू’ के विशेष अंक पर अपनी बात रखते हुए बोले, गोविंद पाल के 40 वर्षों का यह प्रतिफल है कि देश की एक ऐसी नामचीन पत्रिका ‘गुफ़्तगू’ के इस अंक में गोविंद पाल के समग्र साहित्य पर विशेष परिशिष्ट में 32 पृष्ठ पर उनकी कविता की समीक्षा और कविता प्रकाशित की गई है. मैं उन्हें बधाई और शुभकामना देता हूँ. गोविंद पाल की कविताएं हमेशा किसी तथ्य को प्रमाणित करती है. इनकी कविताओं में शब्द, शब्द चुने हुए रहते हैं.
रजनीकांत श्रीवास्तव ने कहा कि समसामयिक हिंदी कविता जगत में गोविंद पाल साहित्य जगत में एक सशक्त सुपरिचित नाम है. हिंदी में प्रकाशित तीन संग्रह ‘परमात्मा के खिलाफ’, ‘बोनसाई’ और ‘महज ये वायरस नहीं’ के माध्यम से गोविंद पाल ने वर्तमान परिदृश्य में अपनी एक पहचान स्थापित कर ली है. बांग्ला भाषा में भी गोविंद पाल की दो कृति ‘ हांटूर नीचे मानुष’ और ‘समयेर पदध्वनि’ को भी सराहा गया. मूलत: गोविंद पाल जन साधारण के कवि हैं. शब्द योजना ऐसी है कि संप्रेषण बहुत आसान हो जाता है. ‘गुफ़्तगू’ के विशेष अंक के लिए बधाई देते हुए बोले, मैं अपनी तरफ से बधाई और शुभकामनाएं देता हूँ एवं आगे की रचना यात्रा और सफल एवं सार्थक होगी.
मुख्यअतिथि प्रसिद्ध व्यंग्यकार विनोद साव ने बांग्ला साहित्य की विरासत पर बोलते हुए कहा कि-

👉 विनोद साव का उद्बोधन
बांग्ला साहित्य और विचार जगत ने देश की मुख्य धारा के साहित्य और विचार जगत का नेतृत्व किया. टैगोर, शरतचंद, बिभूतिभूषण बंदोपाध्याय जैसे उद्भट साहित्यकारों ने देश में विचारों की मुख्यधारा को बल दिया. सत्यजीत राय जैसे फिल्म निर्देशकों ने इन तमाम साहित्यकारों की कथा को अपनी फिल्मों की पटकथा बनाकर जनमानस की संवेदना को झकझोरा. ‘ गुफ़्तगू’ में प्रकाशित गोविंद पाल की कविता ‘आम आदमी’ को पढ़ा और विनोद साव ने ‘आम आदमी’ को वर्तमान संदर्भों में उद्धृत किया.
‘आम आदमी’
संज्ञाहीन अस्तित्वहीन/सिर्फ लोकतंत्र की एक भीड़ है/आज का आम आदमी/सोच एक सड़ी हुई जिंदा लाश है/अपने ही दुर्गंधयुक्त सड़ान्ध से/खुद ही ऊब चुका आम आदमी/एक दूसरे के पास आने कतराने लगा है/दूषित हो चुके समाज की लाशों को/कफ़न ओढ़ाकर मरघट में फ़ेंक दिया है/ जहाँ गिद्ध, कुत्ते, भेड़िये/अपनी वहशी भूख मिटाने/उन लाशों का दावती लुत्फ़ उठा रहे हैं/पर अपने दायरे में सिमटे हुए/संज्ञाहीन, अस्तित्वहीन आम आदमी को/इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता.
दुलाल समाद्दार ने कहा-
वर्तमान समय के ख्यातिमान कवि गोविंद पाल के कुछ चुनी हुई कविताओं को हिंदुस्तानी साहित्य की त्रैमासिक पत्रिका ‘गुफ़्तगू’ में स्थान मिलने पर मेरी शुभकामनाएं और बधाई.
‘गुफ़्तगू’ में प्रकाशित 28 प्रतिनिधि कविता में कवि के उद्देश्य, उत्तरदायित्व साफ झलकता है. उनकी कविताएं सरल, सुपाठ्य एवं सतत से ओतप्रोत है. कुछ कविताओं को उल्लेख भी अपनी समीक्षा में दुलाल समाद्दार ने किया है-
यह एक यज्ञ प्रश्न है कि क्या है कविता? कविता विचारों के द्वंद को साथ लेकर/कल्पनाओं की पंख फैलाकर/उड़ान भरती है/जीवन के धुंध और असमंजस से/बाहर निकलने के लिए/आनंद की अनुभूति देती है कविता/रीढ़ की हड्डी को सीधा रखने/सुर-ताल- लय और स्वाभिमान का उच्छवास है कविता. कविता क्या है? इसके बारे में गोविंद पाल की खोज निरंतर जारी है और कहां तक सफल हुए, इसके जवाब में उनकी अबतक प्रकाशित क ई कविता संग्रह है. जैसे ‘बोनसाई’/’महज यह वायरस नहीं’/ घुटनों के नीचे का आदमी’.
इस वैचारिक प्रथम सत्र का संचालन ‘मुक्तकंठ साहित्य समिति’ के महासचिव ओमप्रकाश शर्मा और आभार व्यक्त ‘बंगीय साहित्य संस्था’ के उपसचिव प्रकाशचंद्र मण्डल ने किया.
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द्वितीय सत्र में ‘मुक्तकंठ’ और ‘ बंगीय’ संस्था के सदस्यों द्वारा काव्य पाठ हुआ. इस सत्र के मुख्यअतिथि वयोवृद्ध बांग्ला लेखक डॉ.भवानी प्रसाद मुखर्जी थे. काव्य गोष्ठी का संचालन ‘ मुक्तकंठ साहित्य समिति’ की उपाध्यक्ष एवं कवयित्री डॉ. बीना सिंह ‘रागी’ ने की.
मंचासीन अतिथि अतनु बनर्जी, डॉ. भवानी प्रसाद मुखर्जी, डॉ. रौनक जमाल, नरेंद्र कुमार सिक्केवाल और नूरसब्बा खान ने भी अपने विचारों के साथ कविता पाठ भी किए. गोविंद पाल ने अपने उद्बोधन में ‘मुक्तकंठ’ समिति के अनुशासन पर उद्गार प्रगट किये.
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काव्य पाठ की कुछ झलकियाँ-
लिख कर किताबें/आप चहाते बन गये/साहित्यकारों के आप उजाले बन गये/रौशन किया हुरु फ़ सभी का ख्याल रख/जिसने पढ़ा, सभी वो दीवाने बन गये/
शेर मतला
जहन में याद जो हर पल रहेंगी
समय बीते मनन हर दिल रहेंगी.
– नवेद रज़ा दुर्गवी
👉 सुप्रसिद्ध कवयित्री अनिता करडेकर कविता पाठ करती हुई…
👉 शायरा नूरसब्बा खान गज़ल की प्रस्तुति देते हुए…
दोनों सत्रों में उपस्थित लेखक एवं रचनाकार व बुद्धिजन-
‘मुक्तकंठ साहित्य समिति’ के उपाध्यक्ष आलोक कुमार चंदा, पुनीत कुमार गुप्ता, ठाकुर दशरथ सिंह भुवाल, डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’, गजराज दास महंत, ओमवीर करण, बीरेंद्रनाथ सरकार, डॉ.एके सिंह, चंद्रा साव, इस्माइल आजाद, मो. हाजी रियाज खान गौहर, कल्याण सिंह लोक, सुरेश कुमार बंछोर, रामबरन कोरी ‘कशिश’, पल्लव चटर्जी, पं. वासुदेव भट्टाचार्य, सुनील चंद्र मंडल, गोविंद बर्मन, धुरव मजूमदार, माला सिंह, नभनीर हंस और बृजेश्वर मलिक.
आभार व्यक्त पत्रकार, कलाकार एवं कवि शमशीर शिवानी ने किया.
{ • रपट, प्रदीप भट्टाचार्य • फोटो सौजन्य डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’, पल्लव चटर्जी }
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