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समीक्षा : ‘आईना हूँ मैं तेरा’ – लेखक एन पी पाठक : पुस्तक परिचय पूनम पाठक ‘बदायूं’

“आईना न झूठ बोलता है न भेदभाव करता है। टूट भी जाए अगर आईना सूरत कई बार दिखाता है।जरूरत है सिर्फ देखने वालों का दृष्टिकोण साफ हो जब सूरत देखी जाए। ”
आदरणीय एन.पी. पाठक “अभाषित “जी (निवासी बिसौली )कवि,गीतकार व गजलकार का काव्य रचना स्रोत “आईना हूँ मैं तेरा” प्राप्त हुआ। यह अनेक विषयों का समावेश है।पुस्तक में यूँ तो 101 रचनाएं हैं। सभी रचनाएं सुन्दर हैँ। कुछ का परिचय इस प्रकार है…..
रचना 1″गणेश वंदना “रचना 2″माँ शारदे माँ” एक कलाकार की भावना प्रदर्शित करती हैँ कि पहले ईश्वर को नमन वंदन करना चाहिए जब भी कोई काम शुरू करें।
रचना 3″आईना हूँ मैं तेरा “जो पुस्तक का भी नाम है। अतिसुंदर रचना है……
“हर एक उम्र की दहलीज पढ़ाता चेहरा।
एक सूरत में कई शक्ल समाता चेहरा।”
रचना4 “मैं अभाषित “कवि के उपनाम से जुड़ी है…..
“कल्पनाओं के परिवेश में,जब मैंने प्रथम प्रवेश कराया।
जिस भाषा से मैंने कहा उस भाषा ने मुझे सिखाया।”
रचना 7″मैं कौन हूँ “एक प्रश्न उठाती है।
“मैं कौन हूँ जो हाड़ मांस का बोझ ढो रहा हूँ।
रौशनी को जगा रहा हूँ अंधेरों में सो रहा हूँ।”
रचना 8″ कलाकार (गीत )”कवि के शौक व सत्य को प्रदर्शित करता है…..
“रंगमंच का मैं अभिनेता अभिनव है किरदार
मेरी।
कलाकार हूँ मैं धरती का अंबर तक है पुकार मेरी।
नायक कभी खलनायक बनता दोनों गुण मेरे अंदर।
जीवन जीने की शैली से,होती न तकरार मेरी।”
चना 12 “चार बूंदों का खेल जीवन “में दर्शन दिखाई देता है….
“दो बूंद सुख में ठहरी,दो बूंद दुख में गह गयी।
चार बूंद का खेल जीवन ठहरी वहीं जो सह गयी।”
रचना 15 ” बटवारा” समाज की हकीकत बताती है……
“घर के बर्तन बट गए भांडे भी बांट डाले।
वो कौन सा कलेजा जो माँ को बांट पाये। ”
रचना 19 “आईना लिये मैं घूमा ” व्यक्ति और समाज की हकीकत बयां करती है…….
“आईना लिए मैं घूमा नगर शहर कूँचा गली।
जो आईने में उतर जाए,वो शक्ल कहीं न मिली।”
रचना 20 “पिता” काफी शिक्षाप्रद है। रचना बहुत कुछ कहती है पिता के अस्तित्व के बारे में। ”
रचना 22 ” मेरा अंतर्द्वंद” बहुत कुछ कहती है।
शब्दों के महत्व से लेकर उनकी हालत तक…..
” पढ़ाई में पढ़ने के लिए होतीं बहुत भाषाएँ। हमने सभी भाषाओं में शब्द लहूलुहान पढ़े। ”
रचना 25 “धृतराष्ट्र “के माध्यम से कवि ने विकारों पर प्रहार किया है।
रचना 27 भी एक हकीकत है….
” जो मशाल इंकलाब उठानी कहे कौन है वो।
जो दूध को दूध पानी को पानी कहे कौन है वो। ”
रचना 31 “दोस्ती “में कवि ने दोस्ती की वास्तविकता का वर्णन किया है।
रचना 36” जिंदगी “बताती है कि जिंदगी क्या है और जिंदगी में क्या चाहिए।
रचना 38 “परियों का देश “(बाल गीत )कवि के बाल मन को दर्शाता है…..
“बादल के टुकड़े को घोड़ा बनाकर
शबनम की बूंदों से खुद को सजाकर।
परियों का जहां संसार
आ चलें चंदा के पार।
मां की सुनाई कहानी मिलेगी
परियों की सुंदर सी रानी मिलेगी।”
रचना 39 “अनेकता में एकता” के माध्यम से कवि ने सभी को मिलकर रहने का संदेश दिया है……..
” फिर से मैला न हमारा दामन होगा
सबसे ऊंचा हमारा यह वतन होगा। ”
कवि ने रचना 41 “शिक्षक /कवि” में शिक्षा व शब्दों का महत्व बताया है। प्रकृति प्रेम रचना में झलकता है…….
“प्रकृति से बड़ा शिक्षक कोई नहीं मेहरबान।
मुश्किल लेखन,कलम बने सबसे आसान।”
रचना 45 में पूर्वजों को धरोहर बताया गया है उनका सम्मान करने की शिक्षा दी गई है।
रचना 46″ सुखनबर /कवि सम्मान “के माध्यम से व्याकरण का ज्ञान दिया है तथा रचना गागर में सागर है।गुणात्मक पहलू इसमें समाये हैँ।
रचना 50 “तेरा क्या जाता “कवि के कर्म को बताते हुए आम जनमानस को शिक्षा देती है और भगवान से भी प्रश्न किया है………
” सबको धनवान बनाता तो तेरा क्या जाता। सबको अमृत पान कराता तो तेरा क्या जाता। ”
रचना 54″आलोचना /आलोचक “आलोचना करने न करने व क्यों आदि को समझाती है…….
” किसकी करोगे आलोचना समझो क्या सही क्या गलत।
आज जहां नहीं इमारत,कल कोई जीर्ण हो ढही होगी। ”
माँ तो भगवान का दूसरा रूप है।रचना 55 “मां” मां के प्रेम और किरदारों को बताती है।कितना सहती है मां।
रचना 56 “मिलावट”…….
” मिलावट को जो समय से मिटा न पाए हम।
ना तन रहे ना धन रहे सिर्फ रह जाये मिलावट। ”
रचना 61 धरा के उपकार को बताती हुई मानवीय गुणों के कम होने की ओर इशारा करती है…..
” झोपड़ी से लेकर पक्की इमारत तक।
यहां किस-किस ने दिया किसको सहारा।
कहां हमारी आजादी कौन हमें समझ प्यारा।
अस्तित्व को तलाशती जिंदगी कहां किनारा। ”
भक्ति की रचनाओं के साथ-साथ रचना 82 “नारी “में कवि ने कहा है……..
” सिया हरन एक नारी का,बना असुर संहार।
नारी से घर द्वार बना और नारी से संसार। ”
रचना 86 ” प्रसंशा “में कवि ने मनुष्य के स्वार्थ पर प्रहार किया है कि सभी प्रसंशा पसंद करते हैं पर सभी तो प्रसंशा के योग्य नहीं होते।
रचना 94 “वृक्ष” कवि के प्रकृति प्रेम को दर्शाती है। कवि ने स्वयं को प्रकृति से जोड़ते हुए कहा है………
” वृक्ष मैं तेरे आंगन का, मुझ में मेरी गंध आती है।
यह प्रकृति प्रतिवर्ष मेरा,नया चोला सजाती है। ”
रचना 96 जज्बा में व्यक्ति को अपना कर्तव्य निभाने को कहा है।नारी सम्मान,सुरक्षा और नारी का सहारा बनने को कहा है…..
“करने का काम आए तो सदके में जाइए।
एक अनाथ बच्ची के नाथ बनके आइये।
“दहेज़ हत्या अपराध, नारियों का क्यों?
दुल्हन के बिना दूल्हे के सपने सजाइये।
नारी अबला सबला, पोषण भक्षण करने वाले तुम।
नारी मान,अपमान, सरंक्षण,आरक्षण वाले तुम।”
रचना 99″ खंडहर मैं आज “के माध्यम से कवि ने कहा है घमंड नहीं करना चाहिए।कवि स्वयं को अभाषित लिखते हैं।रचना में जो शब्द न भी दिखें प्भाव स्पष्ट दिखते हैं…..
“महल था किसी दिन जो खंडहर मैं आज। जिंदगी का भी यही होता अंजाम ऐ आगाज।”
कभी हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत उर्दू में महारथ हासिल किए हैं। ” आईना हूं मैं तेरा” में कई रचनाओं में उर्दू शब्दों का बखूबी प्रयोग किया गया है।
कवि ने पूरे समाज को पुस्तक में लाकर खड़ा कर दिया है।
रचना संख्या 101 “पचपन में बचपन( गीत)” पुस्तक की अंतिम रचना में कवि ने अपने बचपन को याद किया है कुछ इस तरह…….
” बचपन की छांव मेरी फिर से निगार हो।
पचपन पड़ाव में जो बचपन का प्यार हो।
कुछ जतन कर प्रभु वह फिर बहार हो।
कागज की नाव मेरी,भव सिंधु पार हो। ”
पुस्तक “आईना हूँ मैं तेरा” कवि की गहन भावनाओं का भंडार है।कवि का सच्चा अनुभव है।
पुस्तक पढ़ने के बाद लगता है फिर पढ़ा जाए।
यह पुस्तक का संक्षिप्त परिचय है।जब पाठकगण पुस्तक हाथ में लेकर पढ़ेंगे निश्चित ही इसका लाभ प्राप्त करेंगे।पुस्तक अमेज़न पर उपलब्ध है।
• आईना हूँ मैं तेरा
• प्रकाशक- यूनिक फील
• मूल्य- 149 रु.
• पृष्ठ संख्या- 112
• लेखक- एन पी पाठक
[ बिसौली, बदायूं, उत्तरप्रदेश ]
• पुस्तक परिचय- पूनम पाठक ‘बदायूं’
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• संपर्क-
• 97192 33149
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