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सौ बरस के हुए परसाई – विनोद साव
आज परसाई होते तो पूरे सौ बरस के होते. २२ अगस्त १९२४ उनका जन्मदिवस है. लेकिन परसाई ऐसे व्यक्तित्व हैं जो न होते हुए भी हरदम हमारे साथ हैं. हमारे विचारों के भीतर उनके विचार गूंजते रहते हैं. वे हमारी आवाज बनकर खड़े हैं. वे देश की आज़ादी के बाद से हर दशक में विचारवानों और प्रबुद्ध जनमानस के साथ चलते रहे हैं. इसका कारण है कि परसाई हमारे अतीत नहीं हमारे वर्तमान हैं. वे वर्तमानता के रचनाकार हैं. बीता वर्ष २०२३-२४ देश भर में परसाई वर्ष की तरह बीता. पिछले अगस्त माह से लेकर इस अगस्त तक देश के कई हिस्सों में उन्हें खूब याद किया गया. उनके जन्मशती वर्ष पर वैचारिक संगोष्ठियाँ हुईं. कई कई सत्रों में उनके योगदान का स्मरण कर वक्तागण भाव-विव्हल हुए और वक्ताओं को सुनकर श्रोतागण अभिभूत हुए. यह सब परसाई के व्यक्तित्व कृतित्व का न केवल जादू है बल्कि उनका लोक-कल्याणकारी रूप व प्रभाव है. उन्हें पढना, उन पर सुनना और उनकी चर्चा करना अपने आप में एक आनंद दायक अनुभव होता है. वे हम सब लिखने पढने वालों के विचारों के उन्नायक हैं.
इस बीते ‘परसाई-वर्ष’ में मुझ जैसे लेखकों को भी भागीदारी के लिए अनेक स्थानों पर जाने और सीखने के अवसर मिले. पिछले बरस भिलाई के पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी सृजन पीठ से हम लोगों ने परसाई स्मरण कर उनके विचारों का आगाज किया था. छत्तीसगढ़ में हिंदी व्यंग्य के चार स्तंभों – लतीफ़ घोंघी, त्रिभुवन पाण्डेय, प्रभाकर चौबे और विनोदशंकर शुक्ल पर व्याख्यान करवाए गए थे. फिर पिछले बरस ही साइंस कॉलेज दुर्ग के हिंदी विभाग ने विद्यार्थियों शोधार्थियों के लिए ‘हिंदी व्यंग्य और हरिशंकर परसाई’ विषय पर एकल व्याख्यान देने का अवसर दिया. इसमें परसाई पर चर्चा में छात्र छात्राओं की भागीदारी बड़ी उत्सावर्धक दिखी थी.

परसाई की धरती जबलपुर में प्रगतिशील लेखक संघ ने पिछले वर्ष उनकी जन्मतिथि पर विराट आयोजन कर सारे देश के प्रगतिशील साहित्यकारों, रंगकर्मियों और आन्दोलन-कर्मियों को एक जगह एकत्रित कर अपनी ऊर्जा व शक्ति का अहसास करवाया था. यहां परसाई के चिंतन और उनकी चिंताओं के स्वर में सबने अपना स्वर मिलाकर बदलाव और परिवर्तन का उद्घोष किया था. जबलपुर के ही वरिष्ठ व्यंग्यकार रमेश सैनी ने अपने ७५ वें जन्मदिन को परसाई को समर्पित कर एक अभिनव पहल की थी. जबलपुर व्हीकल फैक्ट्री के सभागार में ‘शताब्दी वर्ष और परसाई की प्रासंगिकता” विषय पर व्याख्यान करवाया गया था. देश भर के अनेक व्यंग्यकारों ने यहां परसाई की प्रेरणा से अपनी उपस्थिति देकर परसाई की रचना धर्मिता पर अपने विचार व्यक्त किए थे. इस सत्र की अध्यक्षता मैंने की और कैलाश मंडलेकर इसके मुख्य अतिथि थे. कुंदनसिंह परिहार व राजीव कुमार शुक्ल ने विशेष वक्तव्य दिए. व्यंग्यधारा समूह के मुख्य संयोजक रमेश सैनी और डॉ.रमेश तिवारी ने पूरे वर्ष भर परसाई पर ऑनलाइन गोष्ठियों का प्रत्येक माह में आयोजन करवाया जिसमें व्यंग्यकारों आलोचकों और पाठकों को अपने विचार व्यक्त करने के लिए वे आमंत्रित करते रहे. इसे सोशल मीडिया पर और यूट्यूब पर हर बार जारी किया गया. इनमें ज्ञान चतुर्वेदी, सेवाराम त्रिपाठी व कई अन्य लेखक आलोचकगण अपने सारगर्भित विचार व्यक्त किए.
विगत जुलाई माह में मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मलेन-भोपाल ने ‘नीलम जयंती शब्द उत्सव’ का तीन दिवसीय अनूठा आयोजन संपन्न किया. इस सम्मलेन में ‘शताब्दी स्मरण- वर्तमान परिदृश्य में परसाई’ पर व्याख्यान और रचना पाठ के दो अलग सत्र थे. खड़गपुर के प्रो. पंकज शाह ने ईश्वरचंद विद्यासागर विश्वविद्यालय मिदनापुर के लिए भी परसाई केन्द्रित आयोजन के लिए आमंत्रण भिजवाया था पर ट्रेन रिजर्वेशन न मिल पाने के कारण जाना न हो सका था.
साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ने दुर्ग साइंस कॉलेज में ‘हरिशंकर परसाई : जन्मशती संगोष्ठी” का आयोजन करवाया. परसाई की पुण्यतिथि १० अगस्त पर आयोजित यह कार्यक्रम साहित्य अकादमी के सौजन्य से दुर्ग और उतई के दो शासकीय महाविद्यालयों के तत्वाधान में संयुक्त आयोजन था. इसके उदघाटन सत्र में बीज वक्तव्य ख्यातनाम आलोचक रवि भूषण ने दिया. एक सत्र की अध्यक्षता ‘व्यंग्ययात्रा’ पत्रिका के संपादक डॉ.प्रेम जनमेजय ने की. विद्वान वक्ताओं- डॉ.सियाराम शर्मा, जयप्रकाश, विनोद साव, देवेंद्र कुमार देवेश, राजेंद्र दानी, अभिनेष सुराना व अन्य लेखकों आलोचकों की उपस्थिति व उनके वक्तव्यों ने ‘परसाई: जनतंत्र का गद्यात्मक भाष्य’ पर अपने उद्गार व्यक्त कर इसे और भी सार्थक व सरोकारयुक्त आयोजन सिद्ध कर दिया. .
अपने जीते-जी मिथक हो जाने वाले परसाई आज भी हमारे लिए एक ऐसे मार्गदर्शक और प्रेरणाप्रद चरित्र हैं जिनके नाम से आज साहित्यकारों की प्रतिष्ठा में श्रीवृद्धि हो रही है. ज्ञानरंजन के साथ चर्चा में वे कहते हैं “सम्मान और धन किसी को बुरा नहीं लगता… प्रश्न यह है कि लेखक क्या पुरस्कार के लिए समझौता करता है? यदि नहीं तो पुरस्कार लेने में कोई हर्ज नहीं है.” यहां उनके नाम से प्राप्त यह स्मृति चिन्ह है जो हमें आत्मिक सुख प्रदान कर रहा है.

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