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- ‘बंगीय साहित्य संस्था’ : ‘कॉफी विथ साहित्यिक विचार-विमर्श आड्डा-69’ में शामिल हुए- स्मृति दत्त, दुलाल समाद्दार, प्रकाशचंद्र मण्डल, पल्लव चटर्जी, वीरेंद्रनाथ सरकार, प्रदीप भट्टाचार्य, बृजेश मल्लिक, आलोक कुमार चंदा और पं. बासुदेव भट्टाचार्य शास्त्री : साहित्यिक चर्चा एवं काव्य पाठ
‘बंगीय साहित्य संस्था’ : ‘कॉफी विथ साहित्यिक विचार-विमर्श आड्डा-69’ में शामिल हुए- स्मृति दत्त, दुलाल समाद्दार, प्रकाशचंद्र मण्डल, पल्लव चटर्जी, वीरेंद्रनाथ सरकार, प्रदीप भट्टाचार्य, बृजेश मल्लिक, आलोक कुमार चंदा और पं. बासुदेव भट्टाचार्य शास्त्री : साहित्यिक चर्चा एवं काव्य पाठ

👉 {बाएँ से} पल्लव चटर्जी, आलोक कुमार चंदा, बृजेश मल्लिक, प्रदीप भट्टाचार्य, प्रकाशचंद्र मण्डल, स्मृति दत्त, दुलाल समाद्दार, वीरेंद्रनाथ सरकार और पं. बासुदेव भट्टाचार्य शास्त्री
‘छत्तीसगढ़ आसपास’ [भिलाई निवास : इंडियन कॉफी हाउस : 11 जनवरी, 2025]
बांग्ला भाषा, साहित्य सृजन और साहित्य समाज के लिए समर्पित विगत 60 वर्षों से छत्तीसगढ़ के इस्पात नगरी भिलाई की ‘बंगीय साहित्य संस्था’ की अपनी पहचान है और इस संस्था की प हचान को देशव्यापी बनाया है, संस्था की लिटिल पत्रिका ‘मध्यबलय’.बांग्ला भाषा में प्रकाशित ‘मध्यबलय’ को देश और बांग्ला देश में कई बार विभिन्न साहित्यिक आयोजन में पुरुस्कृत भी किया गया है. ‘बंगीय साहित्य संस्था’ की वर्तमान अध्यक्षा देश की चर्चित बांग्ला कवयित्री श्रीमती बानी चक्रवर्ती और ‘मध्यबलय’ के संपादक बांग्ला के सुप्रसिद्ध कवि दुलाल समाद्दार हैं.
•इस सप्ताह ‘कॉफी विथ साहित्यिक विचार-विमर्श आड्डा-69’ में शामिल हुए-
* श्रीमती स्मृति दत्त
* दुलाल समाद्दार
* प्रकाशचंद्र मण्डल
* पल्लव चटर्जी
* वीरेंद्रनाथ सरकार
* प्रदीप भट्टाचार्य
* बृजेश मल्लिक
* आलोक कुमार चंदा
और
* पं. बासुदेव भट्टाचार्य शास्त्री

▪️ • श्रीमती स्मृति दत्त
प्रारंभ में ‘बंगीय साहित्य संस्था’ की उप सभापति व बांग्ला की वयोवृद्ध लेखिका स्मृति दत्त ने विश्व पुस्तक मेला और हिंदी दिवस के बारे में विस्तृत जानकारी देते हुए अपनी बात को रखी.

▪️ • प्रदीप भट्टाचार्य
‘छत्तीसगढ़ आसपास’ के संपादक व प्रगतिशील कवि प्रदीप भट्टाचार्य ने साहित्य पर अपनी बात रखते हुए बोले कि- एक दौर में बहस थी-साहित्य क्यों और किसके लिए? उत्तर होता था-साहित्य साहित्य के लिए या साहित्य समाज के लिए. एक समय यह था साहित्य का अर्थ है अभिव्यक्ति की आजादी. उन दिनों अभिव्यक्ति की आजादी का अर्थ होता था जेल. आज हमारा साहित्य कहाँ जा रहा है? ये विचारणीय है?

▪️ • दुलाल समाद्दार
‘मध्यबलय’ के संपादक व बांग्ला के ख्यातिलब्ध कवि दुलाल समाद्दार ने कहा कि-आजाद भारत में हम लगभग 77 वर्ष जी चुके. समाज में भारी परिवर्तन हुआ. साहित्य जल्दबाजी की जगह नहीं, धीरज का मुकाम है. हम हैं तो भाषा में है, हम होंगे तो भाषा में होंगे.

▪️ • प्रकाशचंद्र मण्डल
‘बंगीय साहित्य संस्था’ के उप सचिव व बांग्ला-हिंदी के गंभीर कवि प्रकाशचंद्र मण्डल ने विचार-विमर्श पर अपनी बात रखते हुए कहा कि-कला, साहित्य और विशेष रूप से कविता में प्रेम व रसज्ञ होता है. प्रकाशचंद्र मण्डल ने प्राण पुरुष माइकल दत्त के कविताओं का विश्लेषण भी किया.
विचार-विमर्श के बाद स्मृति दत्त, दुलाल समाद्दार, प्रकाशचंद्र मण्डल, पल्लव चटर्जी, वीरेंद्रनाथ सरकार, प्रदीप भट्टाचार्य, बृजेश मल्लिक, आलोक कुमार चंदा और पं. बासुदेव भट्टाचार्य शास्त्री ने अपनी-अपनी प्रतिनिधि रचनाओं का पाठ किया.
👉 • प्रकाशचंद्र मण्डल कविता पाठ करते हुए…
👉 • बृजेश मल्लिक कविता पाठ करते हुए…
👉 • आलोक कुमार चंदा काव्य पाठ करते हुए…
‘कॉफी विथ साहित्यिक विचार- विमर्श आड्डा-69’ की अध्यक्षता स्मृति दत्त, संचालन प्रकाशचंद्र मण्डल और आभार व्यक्त आलोक कुमार चंदा ने किया.
आगामी 14 जनवरी, 2025 को संध्या 4.30 बजे ‘बंगीय साहित्य संस्था’ द्वारा मासिक साहित्यिक आसोर [बैठक] संस्था के वरिष्ठ सदस्य व बांग्ला के सुप्रसिद्ध कवि वीरेंद्रनाथ सरकार के निवास में है. इस बैठक में संस्था के सदस्य ही आमंत्रित हैं.


[ • रपट- प्रदीप भट्टाचार्य, फोटो- क्लिक पल्लव चटर्जी ]
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