- Home
- Chhattisgarh
- एक शिक्षात्मक लेख : ‘इंसानियत – डॉ. रौनक जमाल
एक शिक्षात्मक लेख : ‘इंसानियत – डॉ. रौनक जमाल
▪️
इंसानियत
आज आशा का फिर से मजाक उड़ाया गया, उसके प्राकृतिक रंग और नाक को लेकर। उसकी गरीबी का. लेकिन आज प्रकृति उसे के साथ थी।
वे सभी एक ही स्कूल और एक ही कक्षा के छात्र हैं। लड़के और लड़कियाँ एक साथ पढ़ते हैं। आशा भी उसी कक्षा की लड़कियों में से एक है। इसका रंग हल्का काला है। नाक भी थोड़ी चपटी है। वह गरीब माता-पिता की बेटी है। वह पढ़ाई में अच्छी है, इसलिए आशा के माता-पिता ने उसे अच्छी शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए इस प्रसिद्ध स्कूल में भर्ती करा दिया है, जहां केवल शहर के अमीर लोगों के बच्चे ही पढ़ते हैं। बड़े बाप के बच्चे आशा की गरीबी से नफरत करते हैं,
इसलिए आशा हमेशा उनके निशाने पर रहती है और पूरी क्लास के लड़के-लड़कियां उसका मजाक उड़ाते रहते हैं।
आशा एक होशियार, मेहनती और धैर्यवान लड़की होने के साथ-साथ एक अच्छी छात्रा भी है। वह निश्चित रूप से अपने सहपाठियों की अशिष्टता से परेशान थी, लेकिन उसने कभी भी अपने सहपाठियों के बारे में कक्षा शिक्षक या प्रधानाचार्य से शिकायत नहीं की। इसके बजाय, उसने पूरी तरह से अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित किया और अपने शिक्षकों की पसंदीदा छात्रा बन गई ।
स्कूल के सभी अध्यापक आशा की मदद के लिए हमेशा तैयार रहते थे। यहां तक कि कुछ शिक्षक आशा को आर्थिक सहायता भी देते थे। आशा के ये गुण कक्षा के बच्चों में ईर्ष्या की चिंगारी भी जलाते रहते हैं। लेकिन आज प्रकृति आशा पर मेहरबान थी।
आज शहर की जानी-मानी समाजसेवी रजनी शर्मा स्कूल के दौरे पर स्कूल पहुंचीं और उन्होंने अपनी कार स्कूल के एक कोने में खड़ी कर दी। वह विद्यार्थियों, शिक्षकों और स्कूल स्टाफ की साफ-सफाई और व्यवस्था का निरीक्षण कर रही थी। अचानक उनकी नजर आशा पर पड़ी, जिसे कुछ लड़के-लड़कियां परेशान कर रहे थे। आशा रो रही थी और सभी से विनती कर रही थी।
परेड की घंटी बजी और सभी लड़के-लड़कियां कक्षा में चले गए, लेकिन आशा वहीं रोती रही। रजनी जी आशा के करीब गईं। उन्होने आशा के आंसु पोंछे और उसे अपने साथ प्रिंसिपल के कार्यालय ले गई। प्रिंसिपल को पूरी घटना बताई और ऊंची आवाज में शिकायत की। प्रिंसिपल ने आशा से लड़के-लड़कियों के नाम पूछे और चपरासी को बुलाकर लड़कों को बुला कर लाने को कहा। लड़के-लड़कियां मस्ती करते हुए प्रिंसिपल के ऑफिस में दाखिल हुए और आशा को देखकर सभी चौंक गए। प्रिंसिपल ने सभी को डांटा और उनके अभिभावकों को बुलाने को फोन लगाने लगे । सभी माफी मांगने लगे। प्रिंसिपल ने गुस्से से कहा. मुझसे माफ़ी मत मांगो, आशा से माफ़ी मांगो। सबने हाथ जोड़कर आशा से माफ़ी मांगी और रजनी को आशा की माँ समझकर कहा, “ आन्टी हमें आप भी माफ़ कर दो।” तो रजनी जी चौंककर खड़ी हो गईं और उनके बेटे ने आश्चर्य से कहा, “मम्मी, आप यहाँ ।” मैं तुम्हें स्कूल में पढ़ने के लिए भेजती हूं और तुम यहां लड़कियों को परेशान करते हो। शाम को घर आओ, मैं डैडी से तुम्हारी शिकायत करूंगी और तुम्हारी खबर लेने कहुंगी। प्रिंसिपल मां-बेटे की बातचीत सुनकर हैरान हो गए और बोले.
“क्या आप रवि की माँ हैं? मुझे लगा कि आप आशा की माँ हैं। आपने आशा का समर्थन किया और अपने बेटे की शिकायत की।”
“प्रिंसिपल साहब, आशा भी किसी की बेटी है, अगर वह गरीब है तो क्या हुआ ? भविष्य में कोई उसे परेशान न करे। आशा का ख्याल रखना।”
“हाँ मैडम, मैं इसका ध्यान रखूंगा। मैं आपको शिकायत का औसर नहीं दूंगा।”

कहानी का मूल संदेश-
1. गरीबी और रंग-रूप के आधार पर किसी का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए।
2. हर लड़की सम्मान की हकदार है, चाहे वह अमीर हो या गरीब।
3. माता-पिता को अपने बच्चों को सही संस्कार देने चाहिए।
4. शिक्षकों और समाज के जिम्मेदार व्यक्तियों को ऐसे बच्चों का समर्थन करना चाहिए।
• लेखक डॉ. रौनक जमाल उर्दू, हिंदी भाषी अंतरराष्ट्रीय साहित्यकार एवं एमजेएफ लायन हैं.
• लेखक संपर्क-
• 88390 34844
🟥
chhattisgarhaaspaas
विज्ञापन (Advertisement)