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मास्टर स्ट्रोक [व्यंग्य] : राजशेखर चौबे

🤣 न्यूज़ एंकरों की खुशी
🤣 – राजशेखर चौबे
🤣 [ छत्तीसगढ़, रायपुर ]
इन दिनों चोरी ठगी दंगा बलवा डकैती बलात्कार के ही समाचार ज्यादा दिखते हैं । मैंने समाचार पढ़ा कि अमुक नेता की यह बड़ी उपलब्धि है कि आज के जुलूस में कोई पथराव नहीं हुआ और दंगे नहीं हुए । अंग्रेजी में कहावत है –
” नो न्यूज़ इज़ गुड न्यूज़ ” ,
यह इन दिनों पूरी तरह सही साबित हो रहा है । न्यूज़ होगा तो नकारात्मक खबरें होंगी ही । यह भी कहावत है कि नंगा से ख़ुदा डरे । वैसे नंगे से हरेक कपड़े वाले को डरना चाहिए क्योंकि वे किसी को भी नंगा कर सकते हैं । नंगा और दंगा का ताला कुची जैसा साथ है । जहां नंगा है वहां दंगा है और जहां दंगे हैं वहां नंगे होंगे ही । नंगे नंगई करते करते कब दंगाई बन जाते हैं उन्हें ही पता नहीं चलता है और वे दंगा करने लगते हैं । कुछ लोग इन नंगों को कपड़े से पहचानने का दावा करते हैं । नंगों को क्या आप कपड़ों से पहचान सकते हैं ! दंगा भी युद्ध की तरह बुड्ढों का शग़ल है जिसमें नौजवान ज्यादा मरते हैं । मरने पर खून बहेगा ही । सबके खून का रंग लाल होता है । खून का कोई मजहब नहीं होता । इसी तरह खूनी और दंगाई का भी कोई मजहब नहीं होता है फिर भी लोग— ।
नंगे कभी भी कहीं पर भी आ सकते हैं । दंगा कभी भी कहीं पर भी हो सकता है । पहले चुनाव के आसपास दंगे होते थे , अब त्यौहारों के आसपास भी दंगे होने लगे हैं। त्यौहार पर दंगा भी त्यौहार का रूप ले चुका है । वो त्यौहार ही क्या जो बिना दंगे के गुजर जाए। चुनाव में जीतने वाला खुश होता है परंतु त्यौहार पर सभी खुश होते हैं । चुनाव या त्यौहार पर दंगे होने से कुछ लोग और भी खुश हो जाते हैं अन्यथा दुखी रहते हैं। आजकल के नेताओं पार्टी प्रवक्ताओं और न्यूज़ एंकरों को अभिनय में माहिर होना पड़ता है । उन्हें अपने भावों , खुशी और दुख को छुपाना जरूरी होता है। फिर भी बहुतेरे न्यूज़ एंकर व पार्टी प्रवक्ता दंगों के बाद अपनी खुशी छिपा नहीं पाते हैं और इसका इज़हार भी करते हैं । दंगे होने से एंकरों की पौ बारह हो जाती है।
चैनल की टी आर पी बढ़ जाती है ।टी आर पी बढ़ेगा तो विज्ञापन आएगा। नंगे दंगे के लिए कुछ भी कर सकते हैं । न्यूज़ चैनल टी आर पी के लिए कुछ भी कर सकते हैं। दंगों से कुछ नेताओं को चुनाव में फायदा होता है । नेता चुनाव जीतने के लिए कुछ भी कर सकते हैं । नंगे दंगे करते हैं और नेता चुनाव जीत जाते हैं ।
दंगों के दौरान लगता है पुलिस फिल्मी पुलिस बन जाती है । वह या तो देर से आती है या आती ही नहीं है। कभी कभार वह अदृश्य भी हो जाती है । आम आदमी बखूबी जानता है कि दंगों से किसे फायदा होगा ? वह यह भी जानता है कि दंगे क्यों और कैसे हो रहे हैं ? दंगों को रोकने की औक़ात इसी आम आदमी के पास है लेकिन फ़िलहाल वह सोशल मीडिया में व्यस्त और मस्त है और दंगों की क्लिप देख रहा है।

• राजशेखर चौबे
• संपर्क : 94255 96643
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chhattisgarhaaspaas
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