शब्द चेतना को समर्पित साहित्य सृजन ‘आरंभ’ के शोध प्रबंध स्तम्भ : कवि और कविता – तारकनाथ चौधुरी
▪️ शब्द चेतना को समर्पित साहित्य सृजन ‘आरंभ’ एक साहित्यिक मंच, समिति, पत्रिका या इसे हम शोध-प्रबंध भी कह सकते हैं. साहित्य व लेखन में कभी अंत नहीं होता, इसलिए हम कुछ मुट्ठी भर बुद्धिजीवी ने मिलकर सृजित किया है – ‘आरंभ’.
▪️ ‘आरंभ’ को प्रारंभ करने के उद्देश्य और उनके क्रियाकलापों, साहित्यिक दिशा-निर्देश को हम अगले अंक में बतायेंगे.आज के इस अंक में प्रगतिशील और देश के संभावनाशील कवि छत्तीसगढ़ {चरोदा, भिलाई} के तारकनाथ चौधुरी के बारे में जानेंगे.
▪️ सरकारी शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त हुए तारकनाथ चौधुरी ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ के लिए कुछ वर्षों से कविता लिख रहे हैं. मैं जहाँ तक ‘तारक’ को जानता हूँ, वे अपनी ही किस्म का कवि होना उनकी चाहत में रहा होगा. मित्रों, मैं न तो भाषा विशेषज्ञ हूँ न कोई साहित्य का प्रकांड पंडित. मैंने ‘तारक’ की कविता को पढ़-पढ़ कर जाना कि वे देश के संभावनाशील कवि हैं. ‘तारक’ की कविता प्रगतिशील परंपरा से समकालीन कविता को जोड़ती है. ‘तारक’, ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ के लिए अंत नहीं ‘आरंभ’ हैं और यही हमारी रचनाशीलता है.
-प्रदीप भट्टाचार्य
-परिकल्पना व संयोजक ‘आरंभ’
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आह्वान

कब तलक धीरज धरें,
कब तलक नीरव रहें,
अब उनकी लाशों पर चलो,
विमुक्ति का तीरथ करें।।
क्यों स्वर्ग नर्क बन रहा,
हृदय में दर्द पल रहा,
निर्णय सुदृढ़ के क्षण में भी,
व्यर्थ विमर्श चल रहा।।
बदलाव कुछ नियम में हों,
शुद्धि अधिनियम में हो,
समता-समीकरण ग़लत,
कुछ प्रक्रिया विषम में हो।
हर हाथ में अब अस्त्र हो,
थर्म ना निर्वस्त्र हो,
यदि एक प्राण वो हरें,
मृत्यु उनकी सहस्त्र हो।
मृत्यु उनकी सहस्त्र हो।।
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शुभ रविवार

सप्ताह के बाकी़ दिनों से अलग होता है
रविवार का दिन
कामकाजी लोगों की भागम भाग
सड़कों-रेल्वे प्लेटफार्मों पर कम
घरों में ज्यादा होती है इस दिन
सुबह का नाश्ता,दोपहर का भोजन
शाम का मनोरंजन
और रात्रि भोजन….
सब कुछ और दिनों की तुलना में
अलग,क्योंकि रविवार
एक करता है सबको
परिवार के सदस्यों को,
मित्रों को,आत्मीयों को
साथ ही साथ
अलग-अलग साँचे में ढले
आदमी को।
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आओ भूमिका बदलें

कुछ भी
सीखा नहीं तू
बचपन की उस कहानी से
जिसमें हारता है
अहंकारी,उच्श्रृंखल,
क्षमता-मद में चूर
खरगोश
और जीतता है बाजी़
धीर-गंभीर,अनुशासित
कछुआ
निष्कर्ष अब भी वही है
उस गल्प का
किन्तु पात्र रूपांतरित हैं
आदमी
खरगोश सा हो गया है-
दंभी,अशिष्ट,स्वेच्छाचारी
और समय
कछुए की भूमिका में
अपनी लय में
गतिमान है।
परिणाम में पराजय,
हताशा और पछतावा
लिए छटपटा रहा है।
क्यों न —
विवेक के शिविर में
बैठ,
समय से संधि कर लें
और
सभ्य-शालीन होने का
व्रत लें।
पराजित होने का
भय त्यागकर
वर्तमान काल का
हाथ थामे बढ़ चलें,
आशा का दीप लिए
जीवन की डगर पर
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गीत कैसे लिखूँ

कुछ दिनों
पहले तक
बडी़ आसानी से
ढल जाती थीं-
मेरी भावनायें गीतों में
और जज्बा़त मेरे
ग़ज़लों की सूरतें
हो जाते…..
लेकिन अब
मेरी नज्मो़ं को
छूते नहीं लब
या फिर
उनमें ही
वो सलीका न रहा!
दर्द को तो बस
बिखरने का तहजी़ब ही
आता है…..
वो कब
सलीकेदार हुआ भला?
बिखरा पडा़ है
बहुत सा दर्द-
रेल पटरियों में,
पैरों की छालों में,
भूख से बिलखते बच्चों में
पुलिस की लाठियों से
उभरे घावों में,
जिंदा रहने की-
ख्वा़हिश रखने वाली
आँखों में।
आओ बढा़यें हाथ-
हमदर्दी का,
चुनें
मजबूर मज़दूरों के
दर्द को और
इंसानी मुहब्बत की
करिश्माई छुअन से
बदल दें इन्हें
मसर्रतों,मुस्कुराहटों में
और मैं लिख सकूँ
फिर से
जीवन-गीत!
▪️
• कवि संपर्क-
• 83494 08210
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chhattisgarhaaspaas
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