इस माह के कवि और कविता : प्रकाशचंद्र मण्डल

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माँ

माँ
ज्वाला है
जलकर कठोर हो जाती है.
माँ
मोम है
आँच में भी पिघल जाती है.
माँ
प्यार की मूरत है
जिसे देख ईश्वर भी
स्वर्ग से उतरकर
नतमस्तक हो जाता है.
माँ
वह दवा है
जिसके छूने मात्र से
सब दुःख दर्द
मिट जाती है.
माँ
वो मातृत्व है
जिसकी छाँव ढाल बनकर
नरम बिछोना बन जाती है.
माँ
ख़ुद
हजारों गम सहकर भी
बच्चों के आँखों में
आँसू छलकने नहीं देती.
माँ
ऐसी होती है
खुद जागती रहती है
बच्चों को लोरी गाकर
सुलाती.
माँ
मेरी माँ
जिनकी चरणों में नित वंदना करूं
माँ
मेरी माँ
मैं ‘भारत’ में
माँ की मूरत देखूं.
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मेरी मां की महिमा

एक साधारण सा बीज
जो धरती के गर्भ में दबकर
चारो ओर से आए भीषण दबावो में
एक विशाल वृक्ष का निर्माण करती है ।
ऐसी ही मेरी मां है, जो
एक जादूगरनी की तरह
मेरे सपनों को –
असल रूप देती है,
मुझे वृक्ष की तरह दृढ़ बनाती है ।
मेरे मन में उपजे सारी समस्याओं को
पता नहीं वह कैसे जान जाती है
मेरी इच्छा अनिच्छा को पल में सुलझाती है
मेरी मां छाये की तरह है ,
सूरज के तेज गर्मी से निजात दिलाती है
कोमल बाहों में जकड़ कर
हमें नरम बिछौनों में सुलाती है।
मां मेरी दुखों के पलों के विष को
अमृत की तरह खुद पी जाती है
और मुझे सुख की सपनों में
सैर कराती है –
ऐसी ही है मेरी मां ,
मां तुझे मेरा बारंबार प्रणाम
तुझ जैसी मां मुझे
जन्म जन्म तक मिले
यही मेरी आखिरी ख्वाहिश है।
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माँ तुम कितनी अच्छी हो

मां तुम कितनी अच्छी हो
मेरे लिए ईश्वर से भी ऊंची हो
तुमने जीवन दिया
आसमान से भी प्यार दिया
तुम समर्पित हो
अपने बच्चों के लिए
जिससे वह बहुत बड़ा बन जाय
अपना सिर ऊंचा कर सके
इतना ऊंचा की वह चांद तारों को
स्पर्श कर सके
तुम आशीष देती हो
अपनी संतान को
वह हिमालय की उंचाई को भी
पार कर सके
किंतु यह विडम्बना है
कुछ इनमें से बहुत बड़े होते हैं
इतने बड़े हो जाते हैं कि
जीवन की तमाम उपलब्धियों को
प्राप्त कर लेते हैं
फिर मां उसके घुटनों के नीचे
खड़ी होकर
अपने संतान की ऊंचाई को देखने का
प्रयास करते हुए
अपनी ही गर्दन को
ऊंचा करके देखती है
फिर भी मां अपनी संतान को
गर्व से आनंदित होकर
अपलक देखती रहती है
तात्पर्य यह है कि
प्राय संतान यह
भूल जाते हैं
कि उन्होंने भी अपनी मां के
गर्भ से जन्म लिया है।
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• संपर्क-
• 94255 75471
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chhattisgarhaaspaas
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