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संस्कार : “पापा,मैं नहीं भटकुंगी… “- लेखक, कैलाश जैन बरमेचा

भावना… नाम ही जैसे एक एहसास हो। पतली-दुबली, चंचल मगर समझदार। बचपन से ही अपने पापा राहुल की लाडली। पापा-पुत्री का रिश्ता ऐसा था जिसमें औपचारिकता की दीवार नहीं थी – एक दोस्ताना रिश्ता, खुला संवाद, और परिपक्व स्नेह।
भावना की सबसे बड़ी ताकत थी – उसका अपने पिता से हर बात शेयर करना। जब वह छठवीं कक्षा में थी, तो एक दिन पापा के पास आई और मासूमियत से बोली –
“पापा, मुझे प्रणेश अच्छा लगता है… वह मेरा दोस्त है। बड़ी हो जाऊं तो उससे शादी करूंगी।”
राहुल मुस्कुराए। न उन्होंने डांटा, न टाला। बस बोले –
“बेटा, अभी तू छठवीं में है। जब आठवीं में जाएगी तब सोचेंगे। अब पढ़ाई कर, और खेल खूब खेल।”
भावना को पापा की यह बात बड़ी गहरी लगी। वक़्त बीता… प्रणेश का आकर्षण फीका पड़ने लगा। धीरे-धीरे उसे एहसास हुआ कि प्रणेश सिर्फ उसकी हँसी का साथी था, दुःख में नहीं।
एक साल बाद वह खुद बोली –
“पापा, मुझे अब वह लड़का अच्छा नहीं लगता। मैं उससे दोस्ती नहीं रखना चाहती।”
राहुल ने सिर पर हाथ फेरा और कुछ नहीं कहा। यह ‘कुछ न कहना’ ही पिता की शिक्षा थी।
आठवीं में आई, तो हितेश नामक लड़का उसकी दुनिया में आया। खेल, बातें, मुस्कानें… पर एक दिन चेचक ने सब बदल दिया। चेहरे पर दाग पड़ते ही हितेश का व्यवहार बदल गया। भावना को लगा कि वह तो सुंदरता से प्रेम करता था, मुझसे नहीं।
एक बार फिर उसका भरोसा टूटा। मगर वह टूटी नहीं।
ग्यारहवीं में आदित्य आया। उसने बड़े-बड़े वादे किए। पर जल्द ही वह भी एक अवसरवादी निकला। इस बार भावना अंदर से बहुत कुछ समझ गई।
वह अपने पापा से बोली –
“पापा, अब मुझे समझ आ गया कि सच्चा प्यार वह होता है जो हर हाल में साथ दे… और वो तो आप और माँ में है।”
कॉलेज में भावना अब आत्मविश्वासी हो चुकी थी। दोस्ती की मर्यादा को पहचानती थी। जब दोस्त मोहब्बत की बात छेड़ते, वह हँसकर कहती –
“प्यार तभी करूंगी जब मेरे पापा कहेंगे – यही ठीक है।”
राहुल की परवरिश ने उसे समझदार बना दिया था। वह कभी रोकी नहीं गई, बल्कि समझाई गई थी। आज भावना सफल भी है, और सुरक्षित भी।
कहानी से शिक्षा:
बेटियों को डांटने से नहीं, संवाद से बचाया जा सकता है।
दोस्ताना रिश्ता और पारदर्शिता, बेटियों को भावनात्मक भटकाव से सुरक्षित कर सकते हैं।
हर आकर्षण प्यार नहीं होता, और हर रिश्ता जीवनभर साथ नहीं निभाता।
सच्चे संस्कार वही हैं जो निर्णय लेने की समझ दें – मजबूरी में नहीं, समझदारी में ‘ना’ कहने की ताकत दें।
समाज को प्रेरणा:
पिता को केवल अनुशासक नहीं, संवादी बनना होगा।
बेटियों को अधिकार दीजिए – अपने मन की कहने का, अपनी गलती सुधारने का।
प्रेम के नाम पर हो रहे भावनात्मक शोषण से सिर्फ आत्मबल और सही दिशा से ही बचा जा सकता है।
बेटियों के लिए सुझाव बेटियों को समझना चाहिए कि प्यार किसी के भी मन में कभी भी किसी के प्रति जागृत हो सकता है लेकिन चाहत सबके मन में जागृत नहीं हो सकती जो सच्ची चाहत है वह मां-बाप के पास होती है मां बाप के मन में हमेशा अपने बच्चों के लिए चाहत होती है चाहत में त्याग होता है और प्रेम में आकर्षण होता है आकर्षण कभी भी खत्म हो सकता है लेकिन चाहत हर परिस्थिति में स्वीकार्य होती है.

[ • लेखक कैलाश जैन बरमेचा साहित्यिक व सामाजिक चिंतक हैं और ‘बेटी बचाओ मंच’ दुर्ग के संरक्षक हैं. ]
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